कवर्धा: धर्म नगरी कवर्धा सहित पूरे कबीरधाम जिले को भी धर्म नगरी का हिस्सा माना जाता है, नगरी तो दिखाई देती पर धर्म नही गिरे हुए सिक्के या फेके हुए खोटे सिक्के के समान हो गई है जैसे रुपए सबको प्रिय तो है लेकिन सिक्के को उठाने में शर्म आती है जैसे ठीक उसी तरह जगह जगह पर सड़कों पर मवेशियों को घूमते, बैठे अथवा दौड़ते पाए जा सकते हैं। धर्म की बात करें तो शास्त्रों, मानवीय वैचारिक दर्जा के अनुरूप पालतू पशु जिसे हम गौ माता का दर्जा तो देते जरुर है पर उसका सम्मान में खरा नहीं उतर पा रहे, धर्म की रक्षा व धर्म को बढ़ावा नहीं मतलब गौ माता को सड़को पर छोड़ देना होता है वहीं इन गौ माता की सड़को में अनावश्य दौड़ने, बैठे रहने के वजह से ना जाने कितने परिवार को अपने जन, धन की हानी सहना पड़ रहा है और कितनो का तो इन मवेशियों के वजह से इस माया रूपी संसार से टिकट कट चुका है फलस्वरूप अनेकों लोगों के परिवार को अनाथ भी होते जा रहे हैं चाहे वह किसी भी समुदाय से हो।
दो पहिया वाहन हो या चार पहिया वाहन सहित अन्य वाहनों से टकराकर सड़कों में विचरण कर रही मवेशियों का भी दुर्घटना होने से मौत हो जाया जा रहा है। आज गौ को राजनीति अथवा धर्म को बढ़ावा देने मां का दर्जा तो दे दिया जाता पर बहुतेरे मवेशी मालिक अपनी उस धर्म मां को सड़कों, बाजारों बे फिक्र छोड़ दे रहे हैं जिसके फलस्वरूप आम जनों को परेशानियां तो ही रही है पर उस धर्म को हानि भी हो रही जो गाय को मां का दर्जा दे रही है। सवाल ये उठता है कि आखिर क्यों लोग मां रूपी गाय तथा पिता रूपी बैल को सड़कों में छोड़ दिए जा रहें हैं क्या सिर्फ मंदिर, मस्जिद, देवालय जाकर एक दिखावटी धर्मालंबी बन रहें हैं और धर्म को नर्क में डालने जैसे कृत्यों को अंजाम दे रहे हैं।
छत्तीसगढ़ शासन की योजना नाकाम नजर आ रही, नहीं है धरातल पर
राज्य सरकार की महती योजना नरवा, गरवा, घुरवा, बारी में से एक गरवा यानी गौ सेवा के लिए महत्व पूर्ण योजना रहा जो धर्म को जोड़ते हुए गौ सेवा सर्वोपरि को ध्यान में रखकर भी बनाया गया किंतु भ्रष्ट राज नेता, भ्रष्ट प्रतिनिधियों का सिर्फ राजस्व की आमदनी का जरिया बना रहा यह योजना सिर्फ ग्राम पंचायतों के सरपंच, सचिव व नगरीय निकायों में पदाभिहित प्रतिनिधि व कर्मचारी के सौजन्य से पंच तत्वों में लीन होने के समान हो गया है जिसके परिणाम स्वरूप सड़कों, हाट बाजारों, आदि जगहों पर मवेशियों का जमवाड़ा होता है । राज्य सरकार इस योजना का शुभारंभ सही और सटीक वैचारिक मत से किया तो जरुर है पर कबीरधाम जिले में सफलता देखने को नहीं मिलती।
जिला प्रशासन भी नाकाम मवेशियों पर नहीं पा रहा काबू
गली, सड़क,मोहल्ले में आम बात है मवेशियों को घूमते, विचरण करते देखना पर राष्ट्रीय राजमार्ग हो चाहे अन्य सड़के हो मवेशियों का जमावड़ा लगा ही रहता है मुख्य मार्गो में हमेशा इन मवेशियों के वजह से यातायात व्यवस्था प्रभावित तो होता ही है किंतु अनेकों लोगों का इनके साथ टकराकर लूला लंगड़ा होना पड़ता या तो फिर मौके पर ही मौत भी हो जाती है। इस तरह की घटना आसानी से देखा जा सकता है पर जिला प्रशासन कबीरधाम की ओर से कोई भी कठोर कदम नहीं उठाया जा रहा जिससे इन मवेशी के वजह से होने वाली दुर्घटनाओं से बचा जा सके वहीं प्रशासन व्यवस्था कमजोर साबित हो रही है।
सरफिरे अधिकारी, दिखावा करने में अव्वल
जन हित में कार्य करना प्रशासनिक अधिकारियों की वास्तविक रूप में सराहनीय कार्य पर दिखावटी होना भी गलत है छोटे , छोटे कार्यों को बखूबी अंजाम देकर अखबार, टेलीविजन, सोशल मीडिया में सुर्खियां बटोरने का काम तो कर लेते है आईपीसी, सीआरपीसी की धाराओं का उल्लेख कर चलानी कार्यवाही कर शासन के खजाने में राजस्व की आमदनी तो कर दिया जाता पर हेलमेट नहीं पहनने व सीट बेल्ट न लगाने से उनके जान, मॉल की हानी का हवाला तो दिया जाता है किंतु आम सड़कों पर मवेशियों का जमावड़ा होने से भी किसी भी वाहन चालकों को जन हानी हो सकती है फिर क्यों नहीं उठाते यातायात व्यवस्था को लेकर कोई ठोस कदम यही है दिखावटी हीरो पंथी कार्यवाही करने वाले प्रशासनिक अमलों का।
यह सर्व धर्म मानव हितकर, धर्म की रक्षा, लोक व देश हित की रक्षा के लिए मवेशियों का खुलेआम घूमना, मवेशी मालिकों के द्वारा छोड़ दिया जाना क्या सही है,इस पर विचार किया जाना बेहद जरूरी तथा प्रशासन को भी सजग होना चाहिए जिससे जन मानस को जन व धन के साथ धर्म का भी रक्षा किया जा सके।