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विभागीय ढिलाई की चरम हद:अधिकारियों की “निगरानी–शून्यता” से हुई वन्यजीवों की हत्या, SDO से बीटगार्ड तक संलिप्तता की गंध, कड़़क कार्रवाई की आवश्यकता

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अजय जांगड़े 8085164784

कवर्धा। भोरमदेव अभ्यारण्य में दो इंडियन बायसन/गौर का अवैध शिकार कोई साधारण अपराध नहीं, बल्कि वन विभाग की नाकामी, लापरवाही और जमीनी स्तर तक फैले भ्रष्ट तंत्र का खुला सबूत बनकर उभरा है। संरक्षित क्षेत्र में विद्युत करंट बिछाकर अनुसूची–I प्रजाति के दो गौर का शिकार हो जाना इस बात का सीधा प्रमाण है कि विभाग की गश्त, सुरक्षा और “सतर्कता” केवल कागज़ों में ही सांस ले रही है।

“अभ्यारण्य में मौत का तांडव चलता रहा, लेकिन विभाग सोता रहा”

दो भारी-भरकम बायसन कई घंटों तक तड़पकर मरते रहे, उनके शव काटे गए, मांस बांटा गया—
लेकिन न SDO को खबर, न रेंजर को भनक, न बीटगार्ड को सुराग।
ऐसी चूक नहीं, बल्कि गंभीर विभागीय अपराध की श्रेणी में आती है।स्थानीय लोगों के कटाक्ष भी तीखे हैं “अगर जंगल में SDO–रेंजर की नाकामी का स्मारक बनाना हो, तो यही घटना पर्याप्त है।”अपराधियों की गिरफ्तारी नहीं, अधिकारियों की जवाबदेही जरूरी

वन अमले ने पाँच आरोपियों की गिरफ्तारी कर कार्रवाई का दिखावा तो कर दिया, लेकिन यह कार्रवाई ‘निचले पायदान’ वालों पर की गई खानापूर्ति भर है।
जंगल के भीतर इतनी बड़ी घटना बिना विभागीय संरक्षण के संभव ही नहीं। इसलिए अब माँग जोर पकड़ रही है SDO, रेंजर, डिप्टी रेंजर और बीटगार्ड के मोबाइल कॉल रिकॉर्ड खंगाले जाएँ

ड्यूटी लॉगबुक की फॉरेंसिक जांच हो

गश्त के झूठे दावों की सत्यता की परतें उतारी जाएँ

दोषी अधिकारियों को तात्कालिक निलंबन का सामना करना पड़े जनता कह रही है “जंगल के रखवाले ही अगर जंगल बेचने लगें, तो वन्यजीव मारे ही जाएँगे।”

“गौर की मौत नहीं, विभाग की साख की मौत”

यह मामला सिर्फ दो वन्यप्राणियों की मौत नहीं, बल्कि वन विभाग की प्रतिष्ठा पर भारी चोट है।
क्योंकि निगरानी व्यवस्था विफल रही,गश्त व्यवस्था ध्वस्त रही

बिना संरक्षण के ऐसा संगठित शिकार संभव नहीं, घटना ने साफ संकेत दिया है कि विभाग का सुरक्षा तंत्र “ढह चुका” है, और इसी ढहाव की आड़ में शिकारी फल-फूल रहे हैं।

क्या मामला दबाने की कोशिश?

सूत्रों के मुताबिक कुछ अधिकारी मामले को सीमित दायरे में रखने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि विभाग के बड़े पदों पर बैठे लोगों का नाम उजागर न हो।
पर सच यह है कि “जब शिकार अभ्यारण्य में हो, और विभाग मौन रहे—तो समझो कहीं न कहीं अंदर तक सड़न पहुँच चुकी है।”

स्वतंत्र एजेंसी से जांच की मांग की आवश्यकता इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए वन्यजीव संरक्षण विशेषज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता और आम जनता अब एक सुर में मांग कर रहे हैं कि SIT का गठन किया जाए,स्वतंत्र वन्यजीव अपराध जांच टीम तैनात की जाए,अभ्यारण्य के “उच्च स्तर के अधिकारियों” की भूमिका की गहन जांच की जाए क्योंकि विभागीय जांच में वही बचाए जाते हैं, जिन्हें जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

विभाग की विश्वसनीयता दांव पर

भोरमदेव अभ्यारण्य में हुए इस शिकार कांड ने यह साबित कर दिया है कि विभाग को अब सिर्फ अपराधियों को पकड़ने से आगे बढ़कर अपने अंदर बैठे दोषियों को बेनकाब करना होगा।
तभी जंगल सुरक्षित रहेंगे, और विभाग की गिरती साख वापस लौट सकेगी।

 

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