
अजय जांगड़े
कवर्धा, आदिवासी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग की बेटियों के साथ लगातार हो रही दरिंदगी और अत्याचार की घटनाएँ समाज के लिए गहरी चिंता का विषय बन चुकी हैं। आए दिन कभी कवर्धा की घटना तो कभी पंडरिया तहसील के कामठी जैसे इलाकों से ऐसी दर्दनाक खबरें सामने आती हैं, जिनसे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि आखिर मासूम बच्चियों और गरीब परिवारों की बेटियाँ ही क्यों निशाना बनती हैं?
सत्ता में बैठे नेताओं और राजनीतिक बादशाहों के घरों की बेटियाँ सुरक्षित रहती हैं, लेकिन गरीब और वंचित समाज की बेटियों की इज्जत सरेआम लूटी जाती है। सवाल यह उठता है कि जब राजनीतिक दल हिंदू धर्म और समाज को केवल वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करने में व्यस्त हैं, तब आदिवासियों और दलितों की पीड़ा उनके लिए कोई मायने क्यों नहीं रखती? क्या हिंदू समाज अब सिर्फ राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति का माध्यम बन चुका है?
पुलिस की लाचारी और तंत्र की नाकामी भी उतनी ही शर्मनाक है। जिला पुलिस आदिवासी बेटी के साथ हुई घटना के आरोपियों को पकड़ने में नाकाम रही है। क्या यह विषय संदिग्ध नहीं है कि गरीब और दलित परिवार न्याय के लिए दर-दर भटकते हैं, जबकि दोषी खुलेआम घूमते रहते हैं?
समाज के सामने यह सबसे बड़ा प्रश्न है कि आखिर कब तक अनुसूचित जाति और जनजाति की बहन-बेटियाँ प्रताड़ित होती रहेंगी? क्यों सत्ता और तंत्र उनके आँसुओं की कीमत नहीं समझता? और क्यों न्याय सिर्फ शक्तिशाली और अमीरों की दहलीज पर ही जाकर रुक जाता है ?। यह समय है कि समाज और शासन मिलकर गंभीरता से सोचे—क्योंकि हर बार चुप्पी, हर बार समझौता और हर बार लाचार तंत्र केवल पीड़ित परिवार की पीड़ा को और गहरा कर देता है।





