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मनरेगा के सूचना तंत्र ठप: जिम्मेदारी बनाम जमीनी हकीकत पर प्रशासन मौन

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कवर्धा। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत जिले में संचालित कार्यों को लेकर एक बार फिर सूचना तंत्र की सक्रियता पर सवाल खड़े होने लगे हैं। योजना के अंतर्गत नियुक्त सहायक सूचना अधिकारी की कार्यप्रणाली को लेकर प्रशासनिक और सामाजिक हलकों में गंभीर चर्चा चल रही है। हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि अभी शेष है, लेकिन यह तथ्य निर्विवाद है कि योजना से जुड़ी सकारात्मक उपलब्धियों की तुलना में नकारात्मक खबरें अधिक प्रमुखता से सामने आ रही हैं।

मनरेगा जैसी व्यापक और संवेदनशील योजना में पारदर्शिता, जन-जागरूकता और सामाजिक अंकेक्षण को मूल आधार माना गया है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की धारा 17 में सामाजिक अंकेक्षण और सार्वजनिक भागीदारी पर विशेष बल दिया गया है। ऐसे में सूचना संप्रेषण से जुड़े अधिकारियों की भूमिका केवल औपचारिक न होकर सक्रिय और जवाबदेह मानी जाती है।

स्थानीय जानकारों का कहना है कि जिला स्तर पर कई योजनाओं का प्रचार-प्रसार प्रायः जिला जनसंपर्क विभाग के माध्यम से नियमित रूप से जारी होता है, किंतु मनरेगा से संबंधित उपलब्धियों, प्रगति रिपोर्ट और पारदर्शिता से जुड़े तथ्यों का व्यवस्थित संप्रेषण अपेक्षित स्तर पर परिलक्षित नहीं हो रहा है। यह स्थिति स्वयं में प्रश्न खड़ा करती है कि क्या योजना के सूचना प्रकोष्ठ की भूमिका पूरी तरह प्रभावी है या उसमें सुधार की आवश्यकता है।

कुछ सामाजिक प्रतिनिधियों का मत है कि यदि योजना के सकारात्मक कार्य समय पर और तथ्यात्मक रूप से सार्वजनिक किए जाएं, तो भ्रांतियों और एकतरफा धारणाओं को रोका जा सकता है। वहीं, यह भी चर्चा है कि संबंधित अधिकारी लंबे समय से पदस्थ हैं और उनके दायित्वों के क्रियान्वयन की आंतरिक समीक्षा समय की मांग बनती जा रही है। हालांकि इन बिंदुओं पर विभाग की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

प्रशासनिक विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि किसी भी शासकीय योजना की विश्वसनीयता केवल निर्माण कार्यों से नहीं, बल्कि उसके सूचना प्रबंधन और पारदर्शिता से तय होती है। यदि सूचना तंत्र शिथिल प्रतीत हो, तो जनविश्वास प्रभावित होना स्वाभाविक है।

नियमों की कसौटी पर स्थिति

मनरेगा में पारदर्शिता, सामाजिक अंकेक्षण और सूचना का सार्वजनिक प्रदर्शन अनिवार्य तत्व हैं। सूचना के समयबद्ध प्रसार की जवाबदेही संबंधित प्राधिकृत अधिकारियों की होती है।किसी भी स्तर पर लापरवाही प्रमाणित होने की स्थिति में विभागीय जांच, कार्य समीक्षा अथवा पदस्थापना में परिवर्तन जैसे प्रशासनिक विकल्प नियमों के तहत उपलब्ध रहते हैं।

फिलहाल पूरा मामला आधिकारिक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में है। यदि तथ्यों के आधार पर किसी स्तर पर कमी पाई जाती है, तो विभागीय समीक्षा और सुधारात्मक कार्रवाई अपेक्षित मानी जा रही है। प्रशासन की निष्पक्ष जांच और पारदर्शी निर्णय से ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

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