कवर्धा: विकास खण्ड पंडरिया के वनांचल गांव लोखान में शिक्षा के नाम पर जो मज़ाक हो रहा है, वह किसी एक अफसर या जनप्रतिनिधि की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की संवेदनहीनता का आईना है। शासकीय प्राथमिक शाला का भवन दो साल पहले खंडहर में तब्दील हो गया था। एक साल पहले उसे डिस्मेंटल तो कर दिया गया, लेकिन नया भवन आज तक सिर्फ़ कागजों में ही है।
क्या मज़ाक है ये शाला प्रवेश उत्सव का ?
उधर अफसर शाला प्रवेश उत्सव के नाम पर पौधरोपण की अपील कर रहे हैं, इधर लोखान में विद्यालय ही नहीं है तो पेड़ कहां लगाएं? ज़रा जाकर देखें उन बच्चों की आंखों में, जिनके हिस्से आई है पंचायत भवन की चारदीवारी और एक फूटा पंखा।
पंचायत भवन का एकमात्र अतिरिक्त कक्ष अब पांच कक्षाओं का ‘सांझा स्कूल’ बन गया है। कक्षा 1 से लेकर 5 तक के बच्चे एक ही कमरे में बैठकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, न ब्लैकबोर्ड पर्याप्त, न बेंच, न शौचालय। बच्चों के भविष्य को शायद शासन ने सस्ते राजनीतिक भाषणों और उत्सवों की बलि चढ़ा दिया है।
शर्मनाक है यह चुप्पी
जनप्रतिनिधि हों या जिम्मेदार अधिकारी सबको शायद आदत हो गई है फाइलों पर बैठकर योजनाओं की “सफलता” का झूठा गुणगान करने की। लोखान के बच्चे आज भी धरातल पर शिक्षा के बुनियादी अधिकार से वंचित हैं, लेकिन किसी की जबान नहीं खुलती।
वनांचल की उपेक्षा या साज़िश ?
क्या ये सिर्फ़ अनदेखी है या फिर जानबूझकर वनों में बसे इन मासूमों को शिक्षा से दूर रखने की कोई साज़िश? क्योंकि साल भर से न तो किसी इंजीनियर ने साइट का मुआयना किया, न किसी अधिकारी ने दौरा। ग्रामवासियों ने आवेदन भी दिए, पर जवाब वही पुराना”फाइल प्रक्रिया में है।”
अब सवाल सिर्फ स्कूल का नहीं है, सवाल है भरोसे का।
जब सरकार गांव-गांव स्कूल खोलने की बात करती है, तो क्या लोखान के बच्चे भारत के नहीं हैं? कब तक पंचायत भवन में सिमटकर उनके सपने दम तोड़ते रहेंगे?
ग्रामवासियों ने चर्चा के दौरान चेतावनी दिया है कि अगर जल्द ही शाला भवन की स्वीकृति और निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ, तो वे धरना-प्रदर्शन और स्कूल बहिष्कार जैसे कदम उठाने को बाध्य होंगे।
“शिक्षा के मंदिर को मलबा बना दिया गया, अब देखना ये है कि व्यवस्था कब तक अपनी आंखें मूंदे बैठी रहती है?”