
अजय जांगड़े
कवर्धा:बोड़ला जनपद पंचायत के अंतर्गत मनरेगा योजना के तहत किए जा रहे शासकीय निर्माण कार्य में उच्चतम न्यायालय के स्पष्ट दिशा-निर्देशों की खुलेआम अवहेलना सामने आई है। ग्राम पंचायत बांधा के आश्रित ग्राम झंडी में निर्माणाधीन श्मशान घाट में लाल ईंटों का अवैध उपयोग किया गया है, जबकि इस पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सख्त प्रतिबंध लगाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट रूप से कहा है कि शासकीय निर्माण कार्यों में लाल ईंटों का उपयोग पर्यावरण के लिए घातक है और इसके निर्माण में भारी मात्रा में लकड़ियों की खपत होती है, जिससे वृक्षों की अंधाधुंध कटाई होती है। इसके अलावा, ईंट भट्ठों से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण को बढ़ाता है, जो आम जनता के स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए बेहद खतरनाक है। इसीलिए न्यायालय ने फ्लाई ऐश (ब्रिक्स) ईंटों को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया है, क्योंकि यह पर्यावरण के अनुकूल विकल्प है।
इसके बावजूद बोड़ला जनपद पंचायत के जिम्मेदार अधिकारी और तकनीकी सहायक ने न केवल न्यायालय के आदेशों की अनदेखी की, बल्कि सरकारी धन का दुरुपयोग करते हुए नियमों के विरुद्ध निर्माण कार्य को अंजाम दिया। जानकार सूत्रों के अनुसार, यह निर्माण कार्य तकनीकी सहायक के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में चल रहा है इस निर्माण कार्य की सूचना पटल बना ही नहीं है जिससे इसमें कमीशनखोरी की गंभीर आशंका जताई जा रही है। यह पूरे कार्य की पारदर्शिता और नैतिकता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जब न्यायपालिका ने साफ-साफ दिशा-निर्देश जारी कर रखे हैं, तब भी ऐसे गैरकानूनी कार्य केवल अधिकारियों की लापरवाही या मिलीभगत से ही संभव हो सकते हैं। इस मामले में जिम्मेदार अधिकारी और निर्माण एजेंसी, दोनों ही न्यायालय के आदेशों का मजाक उड़ाते प्रतीत हो रहे हैं।
अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन इस गंभीर मुद्दे को संज्ञान में लेकर दोषियों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई करेगा या फिर इस मामले को राजनीतिक संरक्षण के नाम पर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।
प्रश्न उठता है कि क्या संबंधित तकनीकी सहायक, सहायक अभियंता, निर्माण कार्य एजेंसी तथा जनपद के जिम्मेदार अधिकारी के विरुद्ध न्यायालय अवमानना की कार्यवाही कर उन्हें तत्काल निलंबित किया जाएगा? क्या उनके सर्विस बुक में आपत्ति दर्ज की जाएगी ताकि भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति न हो?
यदि समय रहते इस पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं की जाती, तो यह न केवल न्यायपालिका की अवमानना होगी बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था पर भी जनता का भरोसा कमजोर करेगा। यह मामला उदाहरण बने या उपेक्षित हो जाए, यह अब प्रशासन की संवेदनशीलता पर निर्भर करता है।पर्यावरण से जुड़े इस गंभीर प्रकरण में कलेक्टर कबीरधाम, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत, तथा जनपद सीईओ को चाहिए कि वे त्वरित प्रभाव से जाँच बैठाकर दोषियों के विरुद्ध निलंबन, अनुशासनात्मक कार्यवाही और न्यायालयीन प्रक्रिया के अंतर्गत कठोर दंड सुनिश्चित करें।
यदि इस पर शीघ्र न्यायोचित कार्रवाई नहीं होती, तो यह संदेह को जन्म देगा कि कहीं जिम्मेदारों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त तो नहीं है?





