कवर्धा: कबीरधाम जिले में इन दिनों भारी तादाद में शराब तश्करी संचालित है जो विभागीय अधिकारियों के सह से ही किया जाता है जिले के कोई भी थाना, चौकी इस तरह के कारोबार से अछूता नहीं है जिससे यह समझा जा सके कि नवीन पुलीस अधिक्षक के जिले में पदस्थ होने के बाद लोगों में एक नई उम्मीद जगी थी जो दफन होने के समान हो गया है।
मूक बधिर बन बैठा है विभाग
सम्बन्धित विभाग को अगर कहे तो वास्तव में मूक बधीर से कम नहीं है क्योंकि राजस्व का आमदनी बढ़ाने के लालसा से अपराध को सह देने में अपनी पहचान बना रही। जिससे यह स्पष्ट होता है कि रक्षक बन बैठा है भक्षक। ऐसे में क्या होगा लोकतंत्र की व्यवस्था को डगमगा देने वाले प्रशासनिक अधिकारियों के ऊपर आख़िर कार्यवाही क्यों नहीं क्या राजस्व कमाना ही सम्बन्धित विभाग का मुख्य लक्ष्य बन चुका, अपराध पर शिकंजा कसने की बजाय धन जुटाने में लगी हुई है विभाग।
आखिर दिखावा की कार्यवाही क्यों ?
छोटे छोटे शराब तस्कर को पकड़ कर वाहवाही लूटने वाले थाना, चौकी इस कदर इस अवैध शराब बिक्री तस्कर से संलिप्त हैं जैसे डाकू के शरीर पर खाकी कपड़ा हो। आखिर क्यों जरूरत पड़ने लगी है अपराधियों के साथ मिलकर राजस्व की आमदनी बढ़ाना, क्या? सरकार से मिलने वाली वेतमान पर्याप्त नहीं हैं अपने दैनिक जीवन में जीवन यापन करने के लिए अगर मनरेगा की मजदूर से तुलना किया जाए तो इनकी मासिक इनकम मनरेगा मजदूर से छः गुना अधिक है पर फिर भी अपराधियों को बढ़ावा देकर अवैध शराब तस्कर को बढ़ावा क्यों? क्या होगा लोकतंत्र की व्यवस्था को सुधार करने वाले प्रशासनिक अधिकारी ही डूबे हैं माला माल होने के चक्कर में।
चंद रुपयों के लिए कलंक का टीका
वास्तव में जीवन यापन करने के लिए सरकार द्वारा निर्धारित वेतन पर्याप्त है पर अपराधियों को बढ़ावा देकर राजस्व कमाना चाहने वाले प्रशानिक अधिकारी, कर्मचारी अपने मस्तक में घूसखोर नामक कलंक का टीका लगा कर आखिर कितना ही धन जुटा सकते हैं क्या मान सम्मान से बड़ा धन है अगर आमदानी की बात करे तो सिस्टम से प्राप्त होने वाली आय पर्याप्त है पर अतिरिक्त मासिक आय कमाने के चक्कर बदनाम होते जा रहे विभाग।
पुलीस अधिक्षक को आवश्यकता
पुलीस अधिक्षक को अपने थाना, चौकी क्षेत्र में स्ट्रिंग करने की आवश्यकता क्योंकि पूरे जिले का दायित्व उनके पास है इनके पीठ पीछे करते हैं थाना, चौकी प्रभारी मनमानी जिससे जिला पुलीस प्रशासन लोगों के नजर में बन जाते हैं ईमानदारी पे शक और शक पर ईमानदारी का कारण।