
*देख रहा है न बिनोद….*
*पोल खुलने के डर से अधिकारी कर्मचारी दे रहें हैं सुचना के आधिकार अधिनियम को चुनौती….*
*फर्जी तरीके से कार्यरत कर्मचारी का आखिर कैसे हुआ पदोन्नती….*
छत्तीसगढ धमतरी
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिला में फर्जी तरीके से कार्यरत कर्मचारी का मामला सामने आया है जो सिविल सेवा आचरण अधिनियम को खुला चुनौती देकर बेखौफ होकर कार्यरत हैं।
वहीं मिली जानकरी मुताबिक ये आधिकारी की कहने को तो अनुकम्पा नियुक्ति हुई है लेकिन कायदे से पात्र नहीं होते हुए भी अंधे भूखे आधिकारी के संरक्षण में फर्जी तरीके से नियुक्ति प्रदान किया गया है।

वही उस कर्मचारी का पदोन्नति भी की गई है जो की यह साबित करता है कि आधिकारी के संरक्षण में न जाने और कितने ही ऐसे व्यक्ति होंगे जो फर्जी तरीके से विभागों को अपनी बफौती समझ कार्यरत होंगे जिसकी जांच होना लाजमी है।
वहीं एक आरटीआई कार्यकर्ता के द्वारा उक्त व्यक्ति के संबंध में नियुक्त और पदोनन्नती से वांछित जानकारी चाही गई थी जिसे अधिकारी से सांठगांठ करके व्यक्ति जनाकारी होने के कारण जानकार देने से इंकार किया जा रहा है ।
इससे स्पष्ट है कि सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 की धज्जियां उड़ती दिखाई पड़ रही है।
बहरहाल इस मामले में जिला कलेक्टर से लिखित शिकायत आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा की जाने की बात कही गई है, साथ ही फर्जी अनुकंपा नियुक्ति संबंधी साथ ही सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 18 का 1 के तहत सीधे राज्य सुचना आयोग में शिकायत करने की बात कही है।
यदि क़ानून के दायरे को व्यापक बनाने और छूट देने को अधिक महत्व दिया जाता है, तो लोकतंत्र के लिए इसके दुखद परिणाम होंगे।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 1975 से 2005 तक लगातार इस बात को माना है कि सूचना का अधिकार (RTI) नागरिकों का एक मौलिक अधिकार है। 2005 में, संसद ने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पारदर्शिता वाले क़ानूनों में से एक को लागू किया था। हालांकि, पिछले दशक में अदालतों द्वारा दिए गए कुछ फैसलों और इसकी व्याखाओं से इस शक्तिशाली मौलिक अधिकार के कमजोर होने के आसार नज़र आते हैं। इन पर आरटीआई का इस्तेमाल करने वालों और क़ानूनी बिरादरी को चर्चा करनी चाहिए।
कलेक्टर से शिकायत बाद मामले
सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले
आरटीआई अधिनियम के बारे में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के विश्लेषण से पता चलता है कि ऐसे बहुत कम निर्णय हैं जिनमें सूचना देने के आदेश दिए गए है। जबकि बहुमत निर्णय जानकारी देने से इनकार करने के लिए दिए गए हैं और वे निर्णय छूट के दायरे का विस्तार भी करते हैं। इस उदाहरण के लिए हम शीर्ष अदालत के तीन फैसले लेते हैं:
लोकतंत्र में, नागरिक सरकार के शासक होते हैं और इस प्रकार, सभी जानकारी के सार्वजनिक रिकॉर्ड के मालिक भी होते हैं। क़ानून में बिना किसी रोक-टोक के अधिकांश सूचनाओं को मुहैया कराने के मजबूत प्रावधान हैं और आरटीआई अधिनियम की धारा 22 में कहा गया है कि इसके प्रावधान पहले के अन्य क़ानूनों से ऊपर हैं।
में नाम समेत खुलासा जल्द बने रहें हिन्द मीडिया न्यूज़ के साथ..।
चुनेश साहू 7049466638





