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अक्षय तृतीया पर सजी बचपन की बारात, राजनांदगांव में गुड़्डा-गुड़िया की अनोखी शादी

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राजनांदगांव, — पावन पर्व अक्षय तृतीया के अवसर पर पूरे शहर में उल्लास और श्रद्धा का माहौल देखने को मिला, लेकिन इस बार सबसे खास आकर्षण रहा बच्चों द्वारा रचाई गई गुड़्डा-गुड़िया की पारंपरिक शादी। शहर के गली-मोहल्लों में बचपन की यह मासूम परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी, जहां छोटे-छोटे बच्चे पूरे उत्साह के साथ विवाह समारोह का आयोजन करते नजर आए।

सुबह से ही बच्चों की टोलियां अपने-अपने घरों के आंगन में विवाह की तैयारियों में जुट गईं। कहीं रंग-बिरंगे फूलों से मंडप सजाए जा रहे थे, तो कहीं गुड़्डा-गुड़िया को दूल्हा-दुल्हन की तरह सजाने में बच्चे व्यस्त थे। छोटी-छोटी लड़कियां अपनी गुड़िया को लाल साड़ी, गहनों और चुनरी से सजा रही थीं, वहीं लड़के अपने गुड्डे को साफा और शेरवानी पहनाकर दूल्हा बना रहे थे। विवाह की रस्में भी पूरी परंपरा के साथ निभाई गईं—हल्दी, मेहंदी, फेरे और विदाई तक का पूरा आयोजन किया गया।

इस दौरान बच्चों ने न सिर्फ अपने खेल को सजीव बनाया, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं को भी अपने तरीके से आत्मसात किया। खास बात यह रही कि बच्चे घर-घर जाकर बड़े ही उत्साह से निमंत्रण देते नजर आए—“आज हमारे घर गुड़्डा-गुड़िया की शादी है, आप जरूर आइए!” इस मासूम आमंत्रण को सुनकर पड़ोसी और परिजन भी इस आयोजन में शामिल हुए और बच्चों का उत्साह बढ़ाया।

विवाह समारोह में मेहमानों के लिए मीठे पकवान और प्रसाद की भी व्यवस्था की गई थी। कई घरों में लड्डू, खीर और अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाए गए, जिन्हें आने-जाने वाले लोगों में प्रेमपूर्वक वितरित किया गया। बच्चों की इस अनोखी पहल ने पूरे मोहल्ले में उत्सव का माहौल बना दिया, जहां हर कोई इस नजारे का आनंद लेता नजर आया।

स्थानीय बच्चों ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए बताया, “हमें बहुत मजा आया! हमने खुद मंडप सजाया, गुड़िया को दुल्हन बनाया और बैंड-बाजा भी किया।” बच्चों की यह सादगी और रचनात्मकता सभी का दिल जीत रही थी।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की परंपराएं बच्चों में सामाजिक समझ, रचनात्मकता और सहयोग की भावना विकसित करती हैं। साथ ही यह परिवार और समाज के बीच आपसी जुड़ाव को भी मजबूत करती हैं।

राजनांदगांव में अक्षय तृतीया पर गुड़्डा-गुड़िया की शादी केवल एक खेल नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत का जीवंत रूप है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती जा रही है। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि आधुनिकता के दौर में भी हमारी जड़ें और संस्कार कितने मजबूत हैं।

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