
रायपुर |
छत्तीसगढ़ की राजनीति में धर्म स्वातंत्र्य विधेयक पर राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने इस मुद्दे को लेकर राज्य सरकार और राजभवन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि जिस तेजी से धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को मंजूरी दी गई, उसी तत्परता के साथ आरक्षण संशोधन विधेयक पर निर्णय क्यों नहीं लिया जा रहा है।
कांग्रेस का आरोप है कि धर्म स्वातंत्र्य विधेयक भाजपा के राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा था, इसलिए बिना पर्याप्त कानूनी परीक्षण के ही राज्यपाल ने उस पर हस्ताक्षर कर दिए। बैज के अनुसार, इस विधेयक के कुछ प्रावधान राज्य सूची के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं, ऐसे में इसे राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए भेजा जाना चाहिए था।
कानून के दुरुपयोग को लेकर चिंता
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि अब जबकि धर्म स्वातंत्र्य विधेयक कानून का रूप ले चुका है, यह जरूरी है कि सरकार यह भरोसा दिलाए कि इसका दुरुपयोग नहीं होगा। उन्होंने आशंका जताई कि इस कानून का इस्तेमाल किसी विशेष वर्ग के मौलिक और संवैधानिक अधिकारों के हनन के लिए नहीं किया जाना चाहिए
आरक्षण विधेयक पर चुप्पी क्यों?
बैज ने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ में पिछले साढ़े तीन वर्षों से आरक्षण संशोधन विधेयक राजभवन में लंबित है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले में सरकार गंभीर पहल नहीं कर रही है।
उन्होंने बताया कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2022 में जो नया आरक्षण विधेयक लाया था, उसमें—
अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण 20% से बढ़ाकर 32%
अनुसूचित जाति (SC) के लिए 13%
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 14% से बढ़ाकर 27%
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 4% आरक्षण
का प्रावधान किया गया था।
बैज ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के षड्यंत्र और दुर्भावना के चलते इस विधेयक को राजभवन की आड़ में लंबित रखा गया है।
डिप्टी सीएम का बयान
वहीं छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने इस पूरे मामले पर अलग संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा कि राज्यपाल एक चिंतनशील व्यक्तित्व हैं और धर्म स्वातंत्र्य विधेयक पर हस्ताक्षर की प्रक्रिया तेजी से पूरी हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि संभव है कि जिस समय चर्चा चल रही है, उसी दौरान हस्ताक्षर हो चुके हों या प्रक्रिया अंतिम चरण में हो।
पूर्व मुख्यमंत्री ने भी उठाए सवाल
इस मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने धर्म स्वातंत्र्य विधेयक पर राज्यपाल के हस्ताक्षर को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले भी इस प्रकार के विधेयक राष्ट्रपति द्वारा वापस किए जा चुके हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, तब अलग-अलग मानदंड अपनाना उचित नहीं है।
सियासत गरम, जवाब का इंतजार
धर्म स्वातंत्र्य विधेयक और आरक्षण संशोधन विधेयक को लेकर प्रदेश में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। एक ओर कांग्रेस इसे राजनीतिक पक्षपात का उदाहरण बता रही है, वहीं सरकार की ओर से स्पष्ट और विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।
अब देखना यह होगा कि सरकार आरक्षण विधेयक पर क्या कदम उठाती है और क्या आने वाले समय में इस मुद्दे पर कोई ठोस निर्णय सामने आता है या नहीं।





