
कवर्धा,कबीरधाम जिले के पंडरिया क्षेत्र में अवैध शराब और जुआ का नेटवर्क अब किसी छुपे हुए अपराध की तरह नहीं, बल्कि खुलेआम फैल चुके ऐसे जाल में तब्दील हो चुका है, जिसे देखकर यही प्रतीत होता है कि या तो शासन-प्रशासन अंधा बना बैठा है या फिर सब कुछ जानकर भी चुप्पी साधे हुए है। यह जाल मछुआरे के जाल से भी ज्यादा घातक है—दिखता नहीं, लेकिन हर दिन किसी न किसी परिवार को निगल रहा है।
सुबह होते ही नशे में धुत लोग सार्वजनिक स्थानों, सामुदायिक भवनों, देवस्थानों और यहां तक कि शिक्षा संस्थानों के आसपास डेरा जमाए नजर आते हैं। इन रास्तों से गुजरना अब महिलाओं और मासूम बच्चों के लिए डर और असुरक्षा का पर्याय बन चुका है। सवाल यह है कि क्या यही “सुशासन” है?
जुआ—जो कानूनन प्रतिबंधित है—आज खुलेआम फल-फूल रहा है। लालच में फंसे लोग कुछ ही घंटों में अमीर बनने के सपने देख अपनी जीवन भर की कमाई, पुश्तैनी संपत्ति और अपने परिवार का भविष्य तक दांव पर लगा रहे हैं। परिणामस्वरूप सूदखोरी का जाल फैलता जा रहा है, जिससे आम आदमी का जीवन नर्क बन चुका है। सूदखोर मालामाल हैं और पीड़ित परिवार आत्महत्या, अपराध और बर्बादी की कगार पर खड़े हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सरकार और उसकी नीतियां इतनी लाचार क्यों दिखाई दे रही हैं?क्या यह प्रशासनिक विफलता है या फिर किसी अदृश्य संरक्षण का खेल? कौन सा विभाग है जो कार्रवाई नहीं कर पा रहा—या करना ही नहीं चाहता?
किसके संरक्षण में कबीरधाम जिले के नगरों में जुआ, सट्टा और शराब का यह मौत का तांडव नाच रहा है?
भाजपा सरकार विकास की बात करती है, लेकिन जमीन पर हकीकत यह है कि पंडरिया जैसे क्षेत्रों में सामाजिक ताना-बाना टूट रहा है, अपराध पनप रहा है और आम नागरिक खुद को असहाय महसूस कर रहा है।
अब सवाल सिर्फ जुआ और शराब का नहीं रहा—सवाल है शासन की मंशा का, प्रशासन की ईमानदारी का और उस भ्रष्ट सिस्टम का, जिस पर अब तक लगाम नहीं लग पाई है।
आखिर कब पंडरिया को इस अवैध कारोबार से मुक्ति मिलेगी?
आखिर कब जिम्मेदारों की नींद टूटेगी?या फिर यह मान लिया जाए कि पंडरिया में कानून सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया है?





