
अजय जांगड़े
कवर्धा। छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री के ही जिले कबीरधाम की पंडरिया विधानसभा आज खुलेआम कानून को ठेंगा दिखाने वाले अवैध जुए का गढ़ बनती जा रही है। हालात इतने बेकाबू हैं कि ऐसा प्रतीत होता है मानो कानून-व्यवस्था ने घुटने टेक दिए हों और जुआ माफिया बेधड़क अपने काले साम्राज्य का विस्तार कर रहे हों।
सवाल साफ है ,कानून बड़ा है या जुआ माफिया?
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि सत्ता चाहे कांग्रेस की रही हो या अब भाजपा की, जुए का यह गोरखधंधा कभी नहीं रुका। चेहरे बदले, झंडे बदले, लेकिन जुआ माफियाओं की पकड़ और संरक्षण जस का तस बना रहा। यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित संरक्षण का संकेत माना जा रहा है।
पंडरिया बना स्थायी जुआ अड्डों का नक्शा
बेंद्रीचुआ गांव, केशली गोड़ान, बीरकोना, बदौरा ग्राम से लेकर बम्हदई मंदिर के आसपास की रोपित वनभूमि तक—पूरी विधानसभा में ऐसे कई ठिकाने हैं जो रात होते ही अवैध जुआ अड्डों में तब्दील हो जाते हैं।
रात ढलते ही संदिग्ध तत्वों का जमावड़ा, वाहनों की आवाजाही और असामाजिक गतिविधियां आम हो चुकी हैं। पुलिस गश्त का नामोनिशान तक नहीं दिखता। गांवों और मोहल्लों में शाम के बाद भय का माहौल है।
‘बैठकी’ के नाम पर खुली वसूली, पुलिस सेटिंग का दावा
एक हारे हुए जुआरी ने नाम न छापने की शर्त पर बड़ा खुलासा किया। उसके अनुसार जुआ संचालक प्रति खिलाड़ी 300 से 500 रुपए ‘बैठकी’ के नाम पर वसूलते हैं, जिसे कथित तौर पर पुलिस की सेटिंग बताया जाता है।
भले ही पुलिस इन आरोपों से पल्ला झाड़ रही हो, लेकिन आम जनता के बीच यह चर्चा आम है कि बिना किसी अंदरूनी सांठगांठ के इतना बड़ा अवैध कारोबार चल ही नहीं सकता।
रोज़ लाखों की कमाई, संरक्षण पर गहराता संदेह
स्थानीय सूत्रों के अनुसार पंडरिया में जुए से रोज़ लाखों रुपए की अवैध कमाई हो रही है। इतनी बड़ी रकम का खेल बिना राजनीतिक रसूख, दलालों और कुछ शासकीय कर्मचारियों की परोक्ष छाया के संभव नहीं माना जा रहा।
कागजों में कभी-कभार पुलिस कार्रवाई दिखाई जाती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि माफिया पहले से ज्यादा संगठित और मजबूत हो चुके हैं।
पुलिस से एक कदम आगे माफिया
जुआ संचालक इतनी चतुराई से नेटवर्क चला रहे हैं कि पुलिस की भनक लगते ही मिनटों में अड्डा खाली। हर रात जगह बदलने की रणनीति ने पुलिस को मज़ाक बना दिया है।
पुलिस एक स्थान पर पहुंचती है, तब तक दूसरे इलाके में पत्ते फिर से फेंटे जा चुके होते हैं।
प्रभावशाली घरानों के परिसरों में भी चर्चा
शहर में यह चर्चा अब फुसफुसाहट नहीं, बल्कि खुली आवाज़ बन चुकी है कि कुछ राजनीतिक और प्रभावशाली परिवारों के परिसरों में भी रात के अंधेरे में जुआ संचालित होता है। इससे आम नागरिकों का प्रशासन से भरोसा पूरी तरह डगमगा गया है।
सामाजिक तबाही की जड़ बना जुआ
अवैध जुए का असर पंडरिया की सामाजिक और आर्थिक संरचना को खोखला कर रहा है—
अपराधों में बेतहाशा वृद्धि
नशाखोरी और सूदखोरी चरम पर
उधारी विवाद आम
परिवारों की आर्थिक बर्बादी
युवा पीढ़ी तेज़ी से विनाश की ओर
लोगों का कहना है—“अब पंडरिया में कोई कोना सुरक्षित नहीं रहा, पूरा शहर जुआ माफियाओं की कैद में है।”
सूदखोरी का समानांतर साम्राज्य
सूत्र बताते हैं कि हर रात जुआ अड्डों पर 5 लाख रुपए से अधिक नकदी लेकर सूदखोर पहुंचते हैं।
10% दैनिक ब्याज,10% चक्री रकम,प्रति व्यक्ति 300 से 500 रुपए बैठकी
इन शर्तों ने कई परिवारों को सड़क पर ला खड़ा किया है।
प्रशासन की चुप्पी—लापरवाही या संरक्षण?
सबसे बड़ा और खतरनाक सवाल यही है कि जब पूरा शहर इस अवैध कारोबार से वाकिफ है, तो जिला प्रशासन और पुलिस किस दबाव या किसके इशारे पर चुप हैं?
यह लापरवाही नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था को दी जा रही खुली चुनौती है।
कड़े कदम नहीं उठे तो पंडरिया बनेगा अपराध का केंद्र
स्थानीय नागरिकों, समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों ने जिला प्रशासन और पुलिस के उच्चाधिकारियों से मांग की है कि जुआ संचालकों, सूदखोरों, दलालों और उनके संरक्षण कर्ताओं पर एकसाथ कठोर कार्रवाई की जाए।
चेतावनी साफ है,अगर अब भी आंख मूंदी गई, तो पंडरिया जल्द ही अपराध का ऐसा केंद्र बनेगा, जो पूरे प्रदेश की छवि पर काला धब्बा साबित होगा।





