
अजय जांगड़े 8085164784
कवर्धा।भारत सरकार द्वारा संचालित केंद्रीय आदिवासी विकास योजनाओं का मूल उद्देश्य आदिवासी अंचलों में निवासरत बच्चों को शिक्षा, पोषण और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराकर उनके भविष्य को संवारना है। वहीं छत्तीसगढ़ सरकार ने भी आदिवासी आश्रमों के संचालन को लेकर स्पष्ट नियम-कानून और जवाबदेही तय कर रखी है। बावजूद इसके कबीरधाम जिले में इन योजनाओं की जमीनी हकीकत एक बार फिर कटघरे में खड़ी नजर आ रही है।
आदिम जाति कल्याण विभाग कबीरधाम के अधीन संचालित आदिवासी बालक आश्रम मिनमिनिया (जंगल) में हालात इस कदर बदतर पाए गए कि आश्रम परिसर में ताला जड़ा मिला। सबसे गंभीर और चिंताजनक पहलू यह रहा कि आश्रम अधीक्षक मौके से पूरी तरह नदारद पाए गए, जबकि आश्रम में अध्ययनरत आदिवासी छात्रों को बिना किसी लिखित आदेश, विभागीय अनुमति अथवा वैकल्पिक व्यवस्था के छुट्टी दे दी गई।
नियमों की खुली अवहेलना
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा जारी आश्रम संचालन नियमों के अनुसार अधीक्षक की नियमित उपस्थिति, छात्रों की सतत निगरानी, भोजन, आवास और शिक्षा की निर्बाध व्यवस्था अनिवार्य है। किसी भी स्थिति में आश्रम को बंद करना या छात्रों को छुट्टी देना केवल सक्षम विभागीय अनुमति और अभिभावकों को पूर्व सूचना देकर ही संभव है। इसके बावजूद मिनमिनिया आश्रम में ताला जड़ देना नियम-कानूनों की खुली अवहेलना और गंभीर प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है।
केंद्रीय योजनाओं की मंशा पर पानी
केंद्र सरकार की आदिवासी विकास योजनाएं—जिनका उद्देश्य आश्रम शालाओं के माध्यम से आदिवासी बच्चों का सर्वांगीण विकास करना है—ऐसी घटनाओं से केवल कागजों तक सिमटती नजर आती हैं। जंगल और दुर्गम क्षेत्रों से आए आदिवासी बच्चों के लिए आश्रम ही शिक्षा, सुरक्षा और भविष्य की उम्मीद होते हैं। ऐसे में आश्रम का बंद मिलना और अधीक्षक का गायब रहना बच्चों के भविष्य के साथ खुला खिलवाड़ माना जा रहा है।
प्रशासन की चुप्पी, जवाबदेही पर प्रश्न
आश्रम में ताला लगने की जानकारी सामने आने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से न तो कोई स्पष्ट बयान सामने आया और न ही त्वरित कार्रवाई दिखाई दी। न यह स्पष्ट किया गया कि छात्रों को किस आधार पर छुट्टी दी गई और न ही अधीक्षक की अनुपस्थिति का कारण बताया गया। यह चुप्पी जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
आदिवासी बच्चों के भविष्य से समझौता
सामाजिक सरोकार रखने वालों और शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ऐसी लापरवाहियों पर समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो आदिवासी समाज का शासन-प्रशासन से भरोसा कमजोर पड़ेगा। शिक्षा से वंचित होना आदिवासी बच्चों को फिर उसी अंधकार की ओर धकेल देगा, जिससे बाहर निकालने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें योजनाएं चलाती हैं।
अब आवश्यकता इस बात की है कि जिला प्रशासन पूरे मामले की निष्पक्ष और गंभीर जांच कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करे तथा यह सुनिश्चित करे कि केंद्र व राज्य सरकार की आदिवासी विकास योजनाएं केवल फाइलों तक सीमित न रहें, बल्कि ईमानदारी से धरातल पर लागू हों।
आदिवासी बच्चों का भविष्य किसी भी कीमत पर प्रशासनिक उदासीनता की भेंट नहीं चढ़ना चाहिए।





