
बलौदा बाजार,शहरों और कस्बों के कचरा डंपिंग यार्ड, खुले मैदान और सड़क किनारे आज गौ माता के लिए जीवन और मृत्यु के बीच का मैदान बनते जा रहे हैं। आग, जहरीले धुएं और सड़ते कचरे के ढेर के बीच भोजन तलाशती बेसहारा गौ माताएं न केवल शासन-प्रशासन के दावों की पोल खोल रही हैं, बल्कि तथाकथित गौ संरक्षण व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही हैं।
प्लास्टिक, पॉलीथिन और रासायनिक कचरे से भरे ढेरों के बीच गौवंश का विचरण अब आम दृश्य बन चुका है। कई स्थानों पर कचरे में लगी आग से उठता धुआं उनकी सांसों में जहर घोल रहा है, वहीं भोजन की तलाश में प्लास्टिक निगलने से उनकी अकाल मृत्यु की घटनाएं भी सामने आ रही हैं। बावजूद इसके, न तो नगर निकायों की सक्रियता दिखाई देती है और न ही पशुपालन विभाग या गौ सेवा से जुड़ी संस्थाओं की कोई ठोस पहल।
प्रशासन की चुप्पी, व्यवस्था की नाकामी
प्रश्न यह है कि क्या यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि गौ माता के जीवन से खुला खिलवाड़ है? जिन कानूनों और आयोगों की स्थापना गौ संरक्षण के नाम पर की गई, वे आज कागजों और बोर्डों तक ही सीमित नजर आ रहे हैं। गौ सेवा आयोग, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम और स्थानीय नियम-कायदों का जमीनी स्तर पर पालन न होना व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है।
दिखावटी संरक्षण, जमीनी हकीकत शून्य
गौशालाओं की क्षमता सीमित है, कई जगह वे स्वयं अव्यवस्थाओं का शिकार हैं। न नियमित चारा व्यवस्था, न स्वास्थ्य जांच और न ही सुरक्षित आश्रय। परिणामस्वरूप गौवंश सड़कों, नालियों और कचरा स्थलों पर भटकने को मजबूर है। यह स्थिति केवल संवेदनहीनता नहीं, बल्कि एक संगठित उपेक्षा का संकेत देती है।
कर्तव्य पथ तय हो
गौ माता के नाम पर राजनीति और आयोजनों की भरमार है, लेकिन जब बात उनके वास्तविक संरक्षण की आती है, तो शासन और प्रशासन दोनों की भूमिका संदेह के घेरे में आ जाती है। क्या आग और धुएं के बीच दम तोड़ती गौ माताओं की जिम्मेदारी तय होगी? क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी, या फिर यह त्रासदी भी अन्य फाइलों की तरह दफन हो जाएगी?
समाज और शासन—दोनों की परीक्षा
गौ संरक्षण केवल नारों और कानूनों से नहीं, बल्कि संवेदनशील प्रशासन, सशक्त निगरानी और सामाजिक सहभागिता से संभव है। जब तक कचरा प्रबंधन, गौशाला व्यवस्था और सख्त कानून लागू नहीं होंगे, तब तक आग और धुएं के बीच भोजन तलाशती गौ माता की तस्वीरें हमारी सामूहिक असफलता का आईना बनी रहेंगी।
अब सवाल यही है,क्या शासन और प्रशासन समय रहते जागेगा, या गौ माता को यूं ही मौत के मुंह की ओर धकेलता रहेगा?





