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जनजातीय गौरव दिवस पर रायगढ़ में संस्कृति, परंपरा और अस्मिता का भव्य उत्सव

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रायगढ़। जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर रायगढ़ जिले में रविवार को सांस्कृतिक विविधता, गौरवशाली परंपराओं और आदिवासी अस्मिता का भव्य संगम देखने को मिला। जिले के विभिन्न विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और सांस्कृतिक संगठनों द्वारा पूरे दिन रंगारंग कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में विद्यार्थियों, स्थानीय कलाकारों और समाजजन ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

परंपरागत वेशभूषा में दिखी झलकियाँ

कार्यक्रम स्थल पर बच्चों और युवाओं ने परंपरागत जनजातीय परिधानों में नृत्य और गीत प्रस्तुत किए। विशिष्ट वाद्ययंत्रों—मांदर, ढोल, तुमा, नागरदा—की थाप पर प्रस्तुत ‘राऊत नाचा’, ‘सरहुल नृत्य’ और ‘ढोलनृत्य’ ने दर्शकों का मन मोह लिया। हर प्रस्तुति में जनजातीय समाज की आस्था, प्रकृति की पूजा और सामाजिक एकता की अनूठी झलक दिखाई दी।

प्रदर्शनी में चमकी जनजातीय कला

कार्यक्रम के मुख्य आकर्षणों में जनजातीय हस्तशिल्प और दैनिक उपयोग की पारंपरिक वस्तुओं की प्रदर्शनी शामिल रही। लकड़ी, धातु और मिट्टी से बनी कलाकृतियों के साथ-साथ परंपरागत आभूषण, बांस की टोकरियाँ, फल–फूल और औषधीय जड़ी-बूटियाँ प्रदर्शनी में विशेष ध्यान का केंद्र बनीं।

छात्रों ने जाना जनजातीय इतिहास और वीर गाथाएँ

विद्यालयों द्वारा आयोजित विशेष सत्रों में छात्रों ने वीर नारायण सिंह, बिरसा मुंडा, गुंडाधुर, शहीद मंदराजी जैसे महान जननायकों के संघर्ष और बलिदान के बारे में जानकारी प्राप्त की। शिक्षकों ने बताया कि जनजातीय समाज ने सदियों से प्रकृति संरक्षण, सामाजिक न्याय और समानता की भावना को मजबूत किया है।

सम्मान समारोह में उभरते कलाकारों को मिली सराहना

समारोह के अंत में उभरते हुए जनजातीय कलाकारों, नर्तकों और शिल्पकारों को सम्मानित किया गया। जिला प्रशासन ने घोषणा की कि जनजातीय कला, संस्कृति और शिक्षा के संरक्षण के लिए आने वाले महीनों में विशेष प्रशिक्षण शिविर और कार्यशालाएँ आयोजित की जाएँगी।

रायगढ़ में दिनभर रहा उत्सव का माहौल

शहर में जनजातीय गौरव दिवस के कार्यक्रमों के चलते पूरे दिन उत्सव जैसा वातावरण बना रहा। बच्चों की झांकी, परंपरागत नृत्य, हस्तशिल्प प्रदर्शन और सांस्कृतिक रैली ने यह संदेश दिया कि जनजातीय समाज केवल इतिहास नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की जीवंत संस्कृति की आत्मा है।

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