
कवर्धा। नगर पालिका परिषद के दावों की पोल अब खुलेआम सड़कों पर बिखरे कचरे और बजबजाती नालियों ने खोल दी है। शहर को “स्वच्छ शहर” का तमगा दिलाने वाले अधिकारी और जनप्रतिनिधि अब शायद खुद इस गंदगी के ढेर में अपनी जिम्मेदारी को ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं।
गंगानगर वार्ड क्रमांक 7 की स्थिति यह बयां कर रही है कि नगर पालिका केवल फाइलों और रिपोर्टों में ही साफ-सुथरी है, जमीनी हकीकत में तो पूरा वार्ड गंदगी का अड्डा बन चुका है।
वार्ड नंबर 7 के पार्षद तिलक झारिया हैं, पर वार्डवासी आरोप लगाते हैं कि उन्होंने और नागरिकों ने कई बार फोन और शिकायत कर प्रशासन को सूचित किया, मगर नगर पालिका परिषद कवर्धा की नींद अब तक नहीं टूटी। सड़कों पर जगह-जगह कचरे के पहाड़ खड़े हैं, जिनसे उठती बदबू ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है।
नालियां इतनी गंदी हैं कि उनमें से मच्छरों, कीड़ों, यहां तक कि बिच्छू और सांपों तक का जन्म हो रहा है। इस गंदगी के कारण डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ गया है, लेकिन नगर पालिका प्रशासन के लिए शायद ये “साधारण घटनाएं” हैं।
विडंबना यह है कि शिकायत करने पर न सफाई कर्मी पहुंचते हैं, न अधिकारी। मानो कवर्धा नगर पालिका के लिए जनता की परेशानी अब कोई मायने ही नहीं रखती। जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि आखिर नगर पालिका का “स्वच्छता अभियान” जनता के लिए है या सिर्फ अधिकारियों के प्रचार और फोटोशूट के लिए?
नगर वासियों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो कवर्धा का “स्वच्छता का सपना” सिर्फ पोस्टर और दीवारों पर ही चिपका रहेगा। वास्तविकता यह है कि नगर पालिका की लापरवाही और उदासीनता के कारण कवर्धा की साख धीरे-धीरे “गंदगी के शहर” के रूप में बनती जा रही है। शहरवासी मांग कर रहे हैं कि जिला प्रशासन तत्काल हस्तक्षेप कर इस लापरवाह तंत्र पर कार्रवाई करे, ताकि जनता को इस बदबू और बीमारियों से राहत मिल सके।





