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नगर पंचायत चिखलाकसा में राजस्व विभाग का नया कारनामा

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नगर पंचायत चिखलाकसा में राजस्व विभाग का नया कारनामा निकल कर सामने आया है शासकीय भूमि में अर्ध निर्माण घर का टैक्स किस आधार पर लिया गया हे। और जब सीएमओ साहब को फोन लगाया गया तो सीएमओ साहब का कहना था की मेरी जानकारी में नहीं हे और इसकी जानकारी आप को ari शशिकांत दुबे जी दे सकते हे लेकिन जब शशिकांत दुबे जी को फोन किया गया तो दुबे जी का कहना था की इस की जानकारी हम को नहीं है सवाल यह खड़ा होता हे की जब कार्यपालन अधिकारी को नहीं पता की आप के पंचायत में किसे का tax पटा हे की नहीं तो आप ने मार्क कैसे किया और दूबे जी राजस्व के अधिकार के बिना tax कैसे लिया गया है क्या पूर्व पार्षद जन प्रतिनिधि वा पूर्व उपाध्यक्ष जी की अधिकारियों के साथ मिली भगत की भी जानकारी प्राप्त हो रही है? और क्या पूर्व जन प्रतिनिधि के दबाव से tax काटा गया हे क्या? आम जनता यदि अर्ध निर्माण घर का टैक्स जमा करने आय तो उसे नियम कानून बताया जाता हे और एक जन प्रतिनिधि के लिए नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए नजर आ रहा हे नगर पंचायत चिखलाकसा के आधिकारी व नगर पंचायत अध्यक्ष महोदय क्या कर रही हे पंचायत में अध्यक्ष के नाक के नीचे चल रहा हे नगर पंचायत चिखलाकसा के आधिकारी वा अध्यक्ष की चूपी सवाल खड़े करती है आखिर वार्ड नंबर 02 की पूर्व पार्षद पर इतनी मेहरबानी क्यों? पूछती है चिखलकशा की जनता पूर्व पार्षद ने अपना रजिस्टी घर बेच कर शासकीय भूमि पर कब्जा कर लिया हे पूर्व में वार्ड नंबर 02 की पार्षद रही हे और पार्षद रहते हुए शासकीय भूमि पर कब्जा जमा लिया

 

2.आत्मानंद स्कूल भर्ती घोटाला: , अब केवल एक सूची रद्द कर लीपा-पोती में जुटा प्रशासन

ट्रांसफर होने के बाद भी उन्हें अब तक रिलीव नहीं किया

डोंडी – आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार का बड़ा मामला सामने आया है, जिसमें भर्ती प्रक्रिया के नोडल अधिकारी रहे डीपी कोसरे पर अपनी ही बेटी को नियुक्ति दिलाने का गंभीर आरोप लगा है। जब यह मामला उजागर हुआ, तो जिला प्रशासन ने आनन-फानन में केवल सामाजिक विज्ञान विषय की चयन सूची को निरस्त कर दिया, लेकिन क्या सिर्फ एक सूची को रद्द कर देने से यह भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा? इस पूरे मामले ने न सिर्फ शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि प्रशासन की मंशा पर भी गंभीर शंकाएं खड़ी कर दी हैं। जिस अधिकारी ने अपनी ही बेटी को नौकरी दिलाने के लिए पूरी प्रक्रिया को हाईजैक कर लिया, उसे बचाने की कोशिशें अब भी जारी हैं।

डीपी कोसरे पर कार्रवाई नहीं, जिला प्रशासन की मेहरबानी

 

शासन ने डीपी कोसरे की प्रतिनियुक्ति समाप्त कर उन्हें मूल पद पर भेजने का आदेश तो जारी कर दिया है, लेकिन जिला प्रशासन उन्हें अब तक रिलीव करने से कतरा रहा है। आखिर क्यों? क्या प्रशासन किसी दबाव में काम कर रहा है? या फिर भ्रष्टाचारियों को बचाने का जिम्मा खुद उठाए बैठा है? एक सप्ताह से ज्यादा बीत चुका है, लेकिन डीपी कोसरे को कार्यमुक्त नहीं किया गया है। यह स्पष्ट संकेत है कि प्रशासनिक स्तर पर भ्रष्टाचार को संरक्षण दिया जा रहा है। यदि प्रशासन ईमानदार होता, तो घोटाले की जड़ तक पहुंचने के लिए संपूर्ण जांच कराता और जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई करता।

 

भर्ती में भारी गड़बड़ी, बेरोजगारों के भविष्य से खिलवाड़

 

भर्ती प्रक्रिया में शामिल कमेटी के अन्य सदस्यों की भूमिका भी संदिग्ध है। सवाल ये है कि केवल सामाजिक विज्ञान की सूची ही क्यों रद्द की गई? क्या अन्य विषयों में नियुक्तियां पूरी तरह पारदर्शी थीं? या वहां भी रसूखदारों के रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाया गया?

 

जिला पंचायत की सामान्य सभा की बैठक में जब सदस्य मिथिलेश निरुटी ने यह मुद्दा उठाया, तो शिक्षा विभाग ने सिर्फ जांच का आश्वासन देकर मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश की। अब जबकि घोटाला सार्वजनिक हो चुका है, तब भी सिर्फ एक सूची रद्द कर लीपा-पोती की जा रही है।

 

भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच हो – दोषियों को सख्त सज़ा मिलनी चाहिए

 

ये सिर्फ एक नियुक्ति का मामला नहीं है , यह उन हजारों युवाओं के भविष्य का सवाल है जो योग्य होते हुए भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। नोडल अधिकारी डीपी कोसरे के खिलाफ आपराधिक जांच होनी चाहिए। साथ ही संपूर्ण भर्ती प्रक्रिया की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए। अगर प्रशासन ने समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए, तो यह साफ माना जाएगा कि वह भी इस गड़बड़ी का सहभागी है।

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