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कहानी: “एक पटवारी की सरकार”. पढ़िए पूरी खबर… टीप यह किसी भी वास्तविक घटनाओं से संबंधित नहीं है

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कहानी: “एक पटवारी की सरकार”

गाँव का नाम पंचांग है।
छोटा-सा गाँव, लेकिन यहां का दाखिल-खारिज, नामांतरण और बंटवारा किसी सरकारी दफ्तर की मेज़ पर नहीं, बल्कि सिर्फ एक आदमी की डायरी में तय होता था। वो आदमी—एक साधारण-सा पटवारी।

पर ये पटवारी साधारण कहाँ था?
लोग कहते—यह आदमी जमीन का जादूगर है। खेत में फसल बोओ या न बोओ, इसने कागज में पूरा गाँव बो दिया था।

पहली दृष्टांत: आदिवासी की ज़मीन
गाँव की बस्ती में गोंड समुदाय की एक ज़मीन थी, पुश्तैनी और संरक्षित। कानून साफ बोलता था—“ये ज़मीन आदिवासी की है, इसे गैर-आदिवासी को बेचना मना है। अगर ज़रूरी हो, तो कलेक्टर की इजाज़त और पंजीयक का ठप्पा अनिवार्य है।”

लेकिन इस गाँव में कलेक्टर की जरूरत नहीं थी। क्योंकि पटवारी खुद कलेक्टर था। वो खुद पंजीयक भी था। और खुद अदालत भी।

एक दिन पता चला—आदिवासी की ज़मीन सीधे एक सामाजिक पदाधिकारी व्यक्ति परिवार के नाम चढ़ गई। न कोई रजिस्ट्री, न कोई आदेश, न कलेक्टर की अनुमति। सब कुछ *ऑनलाइन* चुपचाप दर्ज हो गया।

“भाई, ये कैसे हुआ?”
जवाब मिला—
“घर-परिवार की दोस्ती है, थोड़ा भेंट-पूजा भी हुई थी।”

यानी रिश्ता और रिश्वत—यही नया कानून था।

ये उसका पहला कारनामा नहीं था। उससे पहले भी कई बार वो बिना कचहरी-बख्तर के नामांतरण कर चुका था। कौन किसका वारिस है, किसकी जमीन कितनी है—ये सब उसने अपने मन से गढ़ लिया। कभी ज़मीन कम कर दी, कभी ज़्यादा दिखा दी। कभी नक्शा बदल दिया, कभी हदबंदी गायब कर दी।

जब शिकायतें हुईं तो तहसील से आदेश आया—“इसे कहीं और भेज दो।”
वो भेजा भी गया।
लेकिन दो साल बाद वापस लौट आया।
जैसे प्रशासन खुद उसके कदमों में बिछा हो।

दूसरी दृष्टांत: शासकीय ज़मीन का कमाल
गाँव की सरहद में एक टुकड़ा शासकीय ज़मीन थी। सरकारी नक्से में साफ लिखी—सरकारी संपत्ति। लेकिन पटवारी के रिकॉर्ड में एक दिन अचानक वो ज़मीन “निजी” बन गई।

कागज पर लिखा गया—“एक एकड़ ज़मीन फलां किसान के नाम।”
गाँव वाले फिर चौंक गए—“ये कैसे? शासकीय ज़मीन भी निजी बन सकती है?”

पटवारी मुस्कराया।
उसे क़ानून की नहीं, अपनी कलम की ताकत पर भरोसा था।

फिर क्या हुआ?
वो एक एकड़ उसी किसान से निकलकर किसी दूसरे आदमी के पास चली गई। फिर वही खेल—न अनुमति, न रजिस्ट्री, न दफ्तर का कोई चक्कर। केवल एक क्लिक, और ज़मीन नए मालिक के नाम।

गाँव में मशहूर था—“ये पटवारी खुद को कलेक्टर से कम नहीं समझता।”
क्योंकि उसके पास कलम थी।
और उस कलम की स्याही में मेहनतकश किसानों का ख़ून, आदिवासियों का हक़, और सरकारी ज़मीन के नक्शे घुले हुए थे।

गाँव वाले कहते—
“कलेक्टर, तहसीलदार, पंजीयक—सब छुट्टी पर चले जाएं। इस पटवारी से ही सब काम करवा लो। वही आदेश देगा, वही नामांतरण करेगा, वही फैसला सुनाएगा। आखिर असली सरकार तो वही है।”

“जब कानून साफ लिखा है, तो ये खेल कैसे चलता है? क्या प्रशासन अंधा है? या फिर सबको अपना-अपना हिस्सा मिल रहा है?”

सवाल हवा में लटका था।
और पटवारी अपनी कुर्सी पर बैठा था, मुस्कराते हुए।
उसकी नज़र कहती थी—
“कानून किताबों में पढ़ो।
पर ज़मीन चाहिए, तो मेरे पास आओ।”

 

चुनेश साहू 7049466638

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