
फर्जी नियुक्ति का खेल… सेठानी की चुप्पी… जिला प्रशासन की मजबूरी या मिलीभगत?
“जांच की फाइलें कलेक्टर की मेज़ पर होती हैं, पर स्याही संविदा एपीओ की पसंद से टपकती है

धमतरी।
जिला पंचायत इन दिनों विकास कार्यों से ज़्यादा “संविदा एपीओ” के किस्सों के लिए सुर्ख़ियों में है। हालत यह है कि लोग अब हंसी-मजाक में कहने लगे हैं — “जिला पंचायत का असली मुखिया अब वही संविदा एपीओ है, बाकी सब तो नाम के।”
नियुक्ति को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन जवाब कहीं नहीं। शिकायतों की फाइलें दबी हैं, जांच समितियां बनीं तो सही, पर रिपोर्टें कब्रिस्तान की खामोशी में दफन कर दी गईं।
सेठानी की चुप्पी – रहस्य या मजबूरी?
लोग पूछ रहे हैं – जिला पंचायत की सेठानी आखिर क्यों खामोश हैं? सब कुछ जानते हुए भी संविदा अधिकारी के आगे नतमस्तक क्यों हैं? व्यंग्य में जनता तंज कस रही है –
“सेठानी का ताज अब एपीओ के सिर पर है।”
सीईओ या डमी सीईओ?
जिला पंचायत का सीईओ मानो सिर्फ नाम का रह गया है। बैठकों से लेकर फाइलों की दिशा और दशा तय करने तक, हर जगह संविदा एपीओ की पकड़ है।
लोग कह रहे हैं – “सीईओ तो सिर्फ मोहरा हैं, असली कमान संविदा एपीओ के हाथ में है।”
प्रशासन की चुप्पी, जनता की खीझ
जिला प्रशासन की खामोशी ने सवालों को और तेज़ कर दिया है। शिकायतकर्ताओं को न बयान दर्ज करने का मौका मिल रहा है, न न्याय की उम्मीद।
लोग चुटकी ले रहे हैं –
“जांच की फाइलें कलेक्टर की मेज़ पर होती हैं, पर स्याही संविदा एपीओ की पसंद से टपकती है।”

सवाल जो हवा में लटक रहे हैं…
फर्जी नियुक्ति पर कार्रवाई क्यों नहीं?
शिकायतकर्ताओं की अनसुनी क्यों?
सेठानी आखिर किस दबाव में हैं?
पूरा जिला प्रशासन संविदा अधिकारी को क्यों बचा रहा है?
नतीजा – संविदा में स्थायी सत्त
धमतरी के लोग अब खुलकर कह रहे है
“संविदा एपीओ पद पर भले अस्थायी हो, पर ताक़त में स्थायी है।”
व्यंग्य में लोग मज़ाक उड़ाते हैं –
“गाड़ी कोई और चला रहा है, पर स्टीयरिंग एपीओ के हाथ में है।”

👉 अब सवाल यही है – जिला पंचायत की सेठानी कब बोलेंगी?
या फिर जनता को मान लेना चाहिए कि –
“जिला पंचायत की कमान बदल चुकी है, अब असली मुखिया संविदा एपीओ ही है।”
चुनेश साहू 7049466638





