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*बचपन मेरा अब जवान हो गया*

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*बचपन मेरा अब जवान हो गया*

 

बचपन मेरा आज, जवान हो गया, 

ना जाने कैसे मैं, खास से आम हो गया

करता था जो हरकतें रात दिन

उसमें भी अब, पाबंद और लगाम हो गया

बचपन मेरा आज जवान हो गया ।।

 

खूब लिखे थे, लिखने वाले ने ननपन मेरी

हंसते थे हंसाते थे, गिरते थे, फिर उठ जाते थे

अपने इस लड़कपन पर खूब इतराते थे 

न जाने कैसे ये, अब गुमनाम हो गया

बचपन मेरा आज जवान हो गया ।।

 

रो रो कर मंगते थे, ना मिले तो रूठ जाते थे

मेहनत ना देखते थे, उस तात की

श्रमवारि से बनायी थी दौलत अपनी

न जाने कैसे अब, अवसान हो गया

चपन मेरा आज जवान हो गया ।।

 

हंस हंस कर तोड़ते थे, खिलौने अपने

बिखेरते थे सहोदर संग, जैसे भानु की रोशनी

सोचते भी नहीं थे ये आए कैसे

भाई भाई में संघर्ष, अब तो आम हो गया

बचपन मेरा आज जवान हो गया ।।

 

ख्वाबे सिमट जाती है खुद की, अपनों के हर्षो उल्लास में

त्यौहारे मनती है, आत्म की क्षीण-क्षीण गात में

जीवन जी रहा हूं इन्हें, पूरा करने की आश में

करूं तो करूं कैसे, यही अब सप्राण हो गया

बचपन मेरा आज जवान हो गया ।।

 

कहने को तो हम, जीते हैं हंस-हंसकर

समझ में नहीं आता जीवन, जैसे नदी की कलकल

गौर से देखो इस नश्वर कलेवर को

बहता लहु भी अब, विराम हो गया

बचपन मेरा आज जवान हो गया ।।

 

मैंने क्या किया और क्या पाया, जीवन के इस मुकाम में

देह से फिसलने लगी आत्मा, जैसे तत्व तेलीय हाथ से

 गौर से देखो, निकला था दिन बड़े अट्ठहास से 

 परखो तो जरा, कुछ ही समय में अब शाम हो गया 

बचपन मेरा आज जवान हो गया 

बचपन मेरा अब विराम हो गया ।।

 

दुष्यंत कुमार देवांगन, पोटियाडीह 

व्याख्याता (भौतिकी, सेजेस चर्रा)

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