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अन्य संस्कृति की प्रभाव से छत्तीसगढ़ी संस्कृति ह्रास न हो- रवि मानिकपुरी

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पंडरिया-  छत्तीसगढ़ी संस्कृति पर अन्य संस्कृतियों का बढ़ते प्रभाव कही छत्तीसगढ़ी संस्कृति को विलुप्ति की कगार तक ना ले जाए।

रवि मानिकपुरी पू.छात्रसंघ अध्यक्ष ने कहा की – सम्पूर्ण भारतवर्ष में नवरात्रि का महापर्व चल रहा है सभी प्रदेशों में माता की जागरण व अपने अपने संस्कृतियों अनेको नृत्य गान व उत्सव मनाया जा रहा चारो ओर छोर माँ की जयकारा से गूंज उठा है।

इस दौरान अपने अपने संस्कृति को बढ़ावा दिया जाता है ।
वही छतीसगढ़ में गरबा डांडिया जैसे नृत्यों का असर देखने को मिल रहा है जो की अन्य संस्कृति का छत्तीसगढ़ी संस्कृति पर (जगह बना रहा) बढ़ते कदम है।
लोगो में भी अन्य संस्कृति के प्रति गेहरा लगाव देखने को मिल रहा है।

अगर हम अन्य संस्कृति के प्रति प्रेम भाव रखें और अपनी संस्कृति पर उदासीनता तो निश्चित ही हमारी संस्कृति ह्रास की ओर होगी।

छत्तीसगढ़ी संस्कृति की विशालता और गहराई ही हमारी संस्कृति को अन्य संस्कृति से भिन्न और आकर्षण बनाता है। जैसे लोक नृत्यों में पंथी, राऊत नाचा, कर्मा, पंडवानी, सुवा, सैला, गेंदी, काकसार, चेरछेरा और खड़ा नाचा शामिल हैं।

परन्तु अब – छत्तीसगढ़ी संस्कृति पर गरबा डांडिया जैसे अन्य सस्कृति का बढ़ते कदम

छत्तीसगढ़ अपनी सांस्कृतिक विरासत में समृद्ध है। राज्य में एक बहुत ही अद्वितीय और जीवंत संस्कृति है। इस क्षेत्र में 35 से अधिक बड़ी और छोटी रंगो से भरपूर जनजातियां फैली हुई हैं। उनके लयबद्ध लोक संगीत, नृत्य और नाटक देखना एक आनंददायक अनुभव है जो राज्य की संस्कृति में अंतर्दृष्टि भी प्रदान करता हैं। राज्य का सबसे प्रसिद्ध नृत्य-नाटक पंडवानी है, जो हिंदू महाकाव्य महाभारत का संगीतमय वर्णन है। राउत नाचा (ग्‍वालों का लोक नृत्य), पंथी और सुआ इस क्षेत्र की कुछ अन्य प्रसिद्ध नृत्य शैली हैं।

प्रसिद्ध पंडवानी गायिका :तीजन बाई ,रितु वर्मा

पंडवानी – छत्तीसगढ़ का वह एकल नाट्य है, जिसके बारे में दूसरे देश के लोग भी जानकारी रखते हैं। तीजन बाई ने पंडवानी को आज के संदर्भ में ख्याति दिलाई, न सिर्फ हमारे देश में, बल्कि विदेशों में।
पंडवानी का अर्थ है पांडववाणी – अर्थात पांडवकथा, महाभारत की कथा। पंडवानी छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से प्रदर्शन किया जाने वाला लोक गाथागीत है। यह महाकाव्य महाभारत के प्रमुख पात्र पांडवों की कहानी दर्शाता है।*

*एमलोक नृत्यों में पंथी, राऊत नाचा, कर्मा, पंडवानी, सुवा, सैला, गेंदी, काकसार, चेरछेरा और खड़ा नाचा शामिल हैं।
जिसका संरक्षण बहुत ही आवश्यक है।

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