
धर्म के नाम पर सियासी खेल खेलने वाले शिकस्त होने के शिवा कुछ भी नहीं कर सकते : भाजपा विधायक प्रत्याशी के ऊपर बहूतेर प्रकरण आज भी है थाने में दर्ज , हलफनामा में दिया ब्यौरा
संवाददाता:अजय जांगड़े
छत्तीसगढ़ /कवर्धा: छत्तीसगढ़ में राजनीति अमला अभी बहुत ही गरमाई हुई है, इस सियासी खेल के राजा बनने के लिए अनेक लोगों के द्वारा अपनी राजनीतिक लड़ाई लड़ना शुरू हो गया है वहीं जनता को तरह तरह के योजना तथा घोषणा और गारंटी कार्ड सहित शपथ पत्र के माध्यम से लुभाने का काम चल रहा है।
सियासी लोग सियासी नामक अथाह समुद्र में तैरने को तैयार हो ही चुके पर इन तैराकों के बीच यह मसला बना हुआ है कि इस मजधार में बेड़ा पार आखिर कैसे होगा।
लोगों को रिझाने किया जा रहा प्रयास
यह स्पष्ट है कि जब भी चुनावी बिगुल बजने को नजदीकियां बढ़ती जाती हैं पार्टी विशेषों के द्वारा तरह तरह की प्रलोभन मतदाताओं को रिझाने के नाम से दिया जाता है, कोई वस्त्र तो कोई राजस्व देकर मतदाताओं को गुमराह कर अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करने में लगे हैं और किया भी जा रहा।
मतदाताओं का दिल जीतने में कामयाब होना कठिन,कौन होगा हासिल करने में महारथ
आज जनता, बहुत ही गंभीर है और बहुत ही शिक्षित हो चुकी है वो किसी जात,धर्म और मजहब को नहीं देख रही वो सिर्फ वह तैराक का समर्थन करने और उसका पुनः अपने क्षेत्र में स्थापित करने की मन में जिज्ञासा पैदा कर रही है कि विकास की धारा बहाने वाला झूठे वायदे और सलामी नहीं ठोकते मुद्दतें निकल गई राजनीतिक बहरुपयों को उस सिंहासन पर बैठाते पर जो आशा और उम्मीद की किरणथी वह पूर्ण न हो सका, इस कांग्रेस शासन काल में कुछ ही वर्षों में विकास जगी है उसे सोने नहीं देना उचित समझ रही है।
प्रत्याशी गुणवान सरल सहज के साथ साथ कानूनी दाव पेंच से मुक्त रहे इसका भी किया जा रहा स्मरण।क्योंकि आज भी आम जनता के साथ साथ शासकीय अधिकारी, कर्मचारियों के बीच से यह चर्चा निकलकर बाहर आ रही है कि कौन है आखिरकार वह प्रत्याशी जो संगठन के बल सरकारी कर्मचारी, अधिकारी के ऊपर अपना रोप झाड़ने जैसा काम किया है तो क्या उनको समर्थन मात्र धर्म के नाम पर करना वाजिब है कि नहीं यह स्पष्ट है कि इस तरह के प्रत्याशियों को इसकी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है और यह बात जन चर्चाओं में जलते हुए आग की तरह फैल रहा है।
सदियों से कही सुनी आ रही बातें जिसे पहला परिचय ही अंतिम परिचय के रूप में जाना जाता है तो क्या ऐसे शासक, ऐसे राजनेता अथवा प्रतिनिधि को अवसर देना मुनासिब होगा कि वह भिन्न भिन्न कानून की धाराओं के संग जकड़न में बंधी हुई है। और क्या वह आम जनता के विचारों पर खरा उतर पाएगा यद्यपि यह संभव नहीं है जिसके फलस्वरूप शासन की नियमों को बगैर दरकिनार किए आम जनों का सेवा में अपनी अधिकाधिक समय व जनसमर्पित भाव हों जो सदैव नहीं शब्द का उपयोग करना वास्तविक रूप से ना किया हो ऐसे ही लोगों को जनता अपनी शासक अथवा जनसेवक के लिए अपनी बहुमत प्रदान करना चाह रही है मानो प्रतीत हो ही रही है।
कवर्धा विधानसभा क्षेत्र 72 में भोले भाले जनता व चतुर चालाक कार्यकर्त्ता केवल और केवल आस्था को केंद्र बनाकर अपनी साख जमाने में लगी हुई है, धर्म, मजहब को अधार बनाकर अपनी नौका पार लगाने में लगी हुई है जो हर संभव सफलता हासिल नहीं कर सकेगा, क्योंकि मतदाता को विकास और अपनी उज्जवल भविष्य को लेकर मताधिकार का निष्पक्ष एवं निर्भीक होकर प्रयोग करना सही माना जा रहा है ।
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