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सरकारी कमजोरी से नहीं हो पा रहा जल संरक्षण सूख गए नदियां और सरकारी तालाब  कागजों में समंदर जैसे दावे पर प्यासे तड़प मर गए जल जीव 

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कवर्धा। देश और प्रदेश स्तर पर जल संरक्षण को लेकर हर वर्ष बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। सरकारें जागरूकता अभियान चलाती हैं, जल बचाने के संदेश दिए जाते हैं और कई योजनाओं को जल संकट के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। सरकारी दावों और वास्तविक कार्यों के बीच का अंतर लगातार बढ़ता नजर आ रहा है। जल संरक्षण के नाम पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, छोटे-छोटे प्रतीकात्मक कार्यों को बड़े अभियान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और उसके प्रचार-प्रसार में अधिक ऊर्जा दिखाई देती है, जबकि स्थायी समाधान के लिए अपेक्षित प्रयास कमजोर पड़ते नजर आते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार जल संरक्षण केवल नारे और अभियान तक सीमित रहने वाला विषय नहीं है, बल्कि यह भविष्य की पीढ़ियों के अस्तित्व और पर्यावरणीय संतुलन से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। बावजूद इसके, कई स्थानों पर योजनाओं की प्रगति और वास्तविक प्रभाव को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

जल संरक्षण के नाम पर अरबों खर्च, फिर भी संकट बरकरार

जल संरक्षण और जल संसाधनों के विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकारें हर वर्ष बड़ी राशि खर्च करती हैं। बजट में जल संरक्षण, सिंचाई परियोजनाओं, तालाबों के जीर्णोद्धार, नदियों के संरक्षण और भू-जल संवर्धन के लिए भारी प्रावधान किए जाते हैं। इसके बावजूद अनेक गांवों और शहरों में पेयजल संकट लगातार बना हुआ है। गर्मी के मौसम में जलस्तर गिरने और पेयजल की समस्या गंभीर रूप लेती दिखाई देती है।

लोगों का कहना है कि यदि योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन और नियमित निगरानी होती तो हालात इतने गंभीर नहीं होते।

विभिन्न विभागों के कार्यों पर उठ रहे सवाल

जल संरक्षण को लेकर मनरेगा, वन विभाग, जल संसाधन विभाग, कृषि विभाग सहित अन्य विभागों द्वारा अनेक कार्य कराए जाते हैं। इनमें तालाब गहरीकरण, स्टॉप डैम निर्माण, जल स्रोत संरक्षण और वृक्षारोपण जैसे कार्य शामिल हैं। हालांकि इन कार्यों की गुणवत्ता और दीर्घकालिक प्रभाव को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।

क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि यदि योजनाओं का सही तरीके से क्रियान्वयन हो, पारदर्शिता बनी रहे और जिम्मेदार अधिकारी अपनी भूमिका पूरी ईमानदारी से निभाएं, तो जल संकट की स्थिति में काफी हद तक सुधार संभव है।

नदी, नाले और जल स्रोतों की उपयोगिता घटने से बढ़ रही परेशानी

कई क्षेत्रों में नदी, नाले, तालाब और अन्य जल स्रोतों की स्थिति लगातार कमजोर होती दिखाई दे रही है। अवैध खनन, अनियंत्रित भू-जल दोहन, बिना आवश्यकता के बोर खनन तथा जल संसाधनों के असंतुलित उपयोग जैसे कारणों को भी जल संकट के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है।

पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि केवल योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों को प्राथमिकता देते हुए ठोस एवं दीर्घकालिक कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता है। आने वाले समय में यदि इस दिशा में गंभीर पहल नहीं हुई तो जल संकट और अधिक गहरा सकता है।

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