
खबर का असर: कोटवारी सेवा भूमि पर कलेक्टर की सख्ती, लेकिन ‘सिस्टम’ के दीमकों पर कब गिरेगी गाज?
चुनेश साहू | धमतरी
धमतरी जिले में राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली और सरकारी जमीनों की बंदरबांट को लेकर लगातार प्रकाशित हो रही खबरों ने जिला प्रशासन की नींद उड़ा दी है। कलेक्टर अबिनाश मिश्रा ने मामले की गंभीरता को देखते हुए न केवल राजस्व अधिकारियों की विस्तृत समीक्षा बैठक ली, बल्कि कोटवारी सेवा भूमि की खरीदी-बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध और अतिक्रमणकारियों के खिलाफ विशेष अभियान छेड़ने के दो टूक निर्देश जारी कर दिए हैं। कलेक्टर की यह सक्रियता निसंदेह सराहनीय है, लेकिन विडंबना यह है कि राजस्व अमला इन आदेशों को अमलीजामा पहनाने में अब तक पूरी तरह विफल रहा है। हकीकत आज भी ‘दिया तले अंधेरे’ वाली बनी हुई है, क्योंकि भखारा और मगरलोड तहसील में कोटवारी व शासकीय भूमि के सौदों के जो जिन्न बाहर निकले हैं, वे प्रमाणित करते हैं कि भ्रष्टाचार की जड़ें प्रशासनिक तंत्र में कितनी गहरी पैठ बना चुकी हैं।
तहसील भखारा के ग्राम कोसमर्रा में खसरा नंबर 900/3 का प्रकरण राजस्व विभाग के माथे पर कलंक की तरह है। यहाँ ‘ग्राम नौकर’ मद की सुरक्षित और अहस्तांतरणीय भूमि को भू-माफियाओं ने सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर कर निजी संपत्ति की तरह खुर्द-बुर्द कर दिया। इस खेल में रक्षकों ने ही भक्षक की भूमिका निभाई; तत्कालीन पटवारी ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए रिकॉर्ड से ‘ग्राम नौकर’ शब्द विलोपित कर वहाँ ‘भूमिस्वामी’ अंकित कर दिया। छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धाराएं और शासन के स्पष्ट दिशा-निर्देशों की धज्जियाँ उड़ाते हुए, बिना कलेक्टर की अनिवार्य अनुमति के इस बेशकीमती भूमि की रजिस्ट्री करा दी गई। पराकाष्ठा तो तब हो गई जब डिजिटल ‘भुईयां’ पोर्टल पर भी बिना किसी वैध नामांतरण प्रक्रिया के सीधे क्रेता का नाम दर्ज कर उसे प्रमाणित कर दिया गया। तहसीलदार की जांच में जालसाजी, अभिलेख छेड़छाड़ और फर्जीवाड़े की पुष्टि होने के बावजूद अब तक दोषियों पर एफआईआर (FIR) दर्ज न होना यह संकेत देता है कि भ्रष्ट तंत्र के भीतर ही गुनहगारों को बचाने की सुनियोजित साजिश रची जा रही है।

यद्यपि कलेक्टर अबिनाश मिश्रा की छवि एक अत्यंत संवेदनशील और कर्मठ अधिकारी की है, जिन्होंने ‘सुशासन तिहार’ के मद्देनजर पारदर्शिता हेतु कड़े निर्देश दिए हैं—जिसमें बिना पूर्वानुमति अवकाश पर रोक और ‘एग्रीस्टेक’ प्लेटफॉर्म का प्रभावी उपयोग शामिल है—किंतु जमीनी सच्चाई इससे कोसों दूर है। कलेक्टर जनदर्शन में नागरिकों की समस्याएं संवेदनशीलता से सुनते हैं और त्वरित निराकरण के निर्देश भी देते हैं, परंतु उनके अधीनस्थ कर्मचारी इन आवेदनों को महज एक ‘औपचारिक कागज’ समझकर ठंडे बस्ते में डाल देते हैं या खानापूर्ति कर विलोपित कर देते हैं। सिलौटी में शासकीय भूमि घोटाले में वर्ष 2025 में जारी एफआईआर के आदेशों का अब तक पुलिस फाइलों में दबा रहना इसी प्रशासनिक शिथिलता और साठगांठ का जीवंत प्रमाण है।
इसके अतिरिक्त, जिले में बेतरतीब अवैध प्लाटिंग का काला खेल भी बदस्तूर जारी है। धमतरी विधायक द्वारा विधानसभा के पटल पर इस मुद्दे को उठाने और जांच में पटवारियों के दोषी पाए जाने के बावजूद, सक्षम अधिकारी (एसडीओ राजस्व) द्वारा अब तक कोई दंडात्मक कार्रवाई न करना अचंभित करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि राजस्व प्रशासन ने संवेदनशील कलेक्टर की छवि को धूमिल करने का अघोषित प्रण ले लिया है। कोसमर्रा मामले में भी कार्रवाई के नाम पर केवल कोटवार से इस्तीफा लेकर पद रिक्त कर दिया गया, जबकि चर्चा यह है कि तहसील कार्यालय से मिलीभगत कर उसी परिवार के किसी अन्य सदस्य को वंशानुगत आधार पर नियुक्त करने की तैयारी है। यह माननीय उच्च न्यायालय बिलासपुर के उस ऐतिहासिक फैसले की भी अवहेलना है, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि कोटवार की नियुक्ति काबिलियत और पारदर्शिता के आधार पर होनी चाहिए, न कि वंशवाद पर।
अब जबकि 1 मई से ‘सुशासन तिहार’ का आगाज हो रहा है और मुख्यमंत्री के आगमन की प्रबल संभावना है, जिला प्रशासन के पास अपनी साख बचाने का यह अंतिम अवसर है। यदि कोसमर्रा जैसे गंभीर मामलों में संलिप्त कोटवार, क्रेता और पटवारी पर तत्काल आपराधिक प्रकरण दर्ज कर भूमि की सरकारी मद में वापसी नहीं की गई, तो सुशासन का यह उत्सव केवल एक कागजी औपचारिकता बनकर रह जाएगा। धमतरी की जनता अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है; उन्हें उन भू-माफियाओं और भ्रष्ट नुमाइंदों पर कठोर कार्रवाई चाहिए जो सार्वजनिक संपत्ति को निगल रहे हैं। यदि आज इन बेशकीमती जमीनों को नहीं बचाया गया, तो भविष्य में लोक विकास, स्वास्थ्य केंद्र और शिक्षण संस्थानों के लिए जिले के पास भूमि का एक टुकड़ा भी शेष नहीं बचेगा ।
चुनेश साहू 7049466638





