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सीजफायर शर्तों में शामिल किया ‘टोल टैक्स’ प्रस्ताव; भारतीय विशेषज्ञों ने जताई चिंता, दक्षिण अंडमान में भी टोल की मांग उठी

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होर्मुज जलडमरूमध्य पर टोल वसूली की तैयारी में ईरान, वैश्विक समुद्री व्यापार पर मंडराया संकट

नई दिल्ली/तेहरान:

मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच ईरान ने एक ऐसा प्रस्ताव सामने रखा है, जिसने अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। ईरान अब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक, होर्मुज जलडमरूमध्य, से गुजरने वाले जहाजों पर टोल टैक्स वसूलने की योजना बना रहा है।

सूत्रों के अनुसार, ईरान ने हालिया संघर्ष के बाद प्रस्तावित सीजफायर की शर्तों में यह मांग भी शामिल की है कि उसे इस जलडमरूमध्य पर अधिक नियंत्रण दिया जाए और वहां से गुजरने वाले तेल टैंकरों से कम से कम एक डॉलर प्रति बैरल का शुल्क वसूला जाए।

वैश्विक व्यापार की ‘लाइफलाइन’ पर असर

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त और रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चा तेल गुजरता है। खाड़ी देशों से निकलने वाला तेल इसी मार्ग के जरिए एशिया, यूरोप और अमेरिका तक पहुंचता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान टोल वसूली लागू करता है, तो इससे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। इससे भारत जैसे तेल आयातक देशों पर भी सीधा असर पड़ेगा।

भारतीय विशेषज्ञ की प्रतिक्रिया

भारत के प्रसिद्ध बैंकिंग और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ अजय बग्गा ने इस प्रस्ताव पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि यदि ईरान को इस तरह टोल वसूलने की अनुमति दी जाती है, तो यह एक खतरनाक मिसाल बन सकती है।

अजय बग्गा ने सुझाव दिया कि अगर यह व्यवस्था वैश्विक स्तर पर स्वीकार की जाती है, तो भारत को भी अपने सामरिक समुद्री क्षेत्रों, खासकर दक्षिण अंडमान के आसपास से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलने पर विचार करना चाहिए।

उन्होंने चेतावनी दी कि इससे अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों का “व्यावसायीकरण” बढ़ेगा और हर देश अपने-अपने हिस्से में शुल्क लगाने लगेगा, जिससे वैश्विक व्यापार जटिल हो जाएगा।

अंतरराष्ट्रीय कानून पर उठे सवाल

समुद्री कानून विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर इस तरह टोल वसूली का अधिकार सीमित होता है और यह कई वैश्विक संधियों के दायरे में आता है। संयुक्त राष्ट्र के समुद्री कानून (UNCLOS) के तहत प्रमुख जलडमरूमध्य आमतौर पर सभी देशों के लिए खुले रहते हैं।

ऐसे में ईरान की यह मांग अंतरराष्ट्रीय नियमों से टकरा सकती है और इस पर वैश्विक स्तर पर विवाद बढ़ने की आशंका है।

भारत पर संभावित असर

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है, जो इसी मार्ग से होकर आता है। ऐसे में टोल लागू होने पर आयात लागत बढ़ सकती है, जिसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है।

साथ ही, भारतीय नौवहन और व्यापारिक कंपनियों के लिए भी अतिरिक्त वित्तीय बोझ बढ़ेगा।

क्या बनेगा नया वैश्विक ट्रेंड?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान का यह प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो दुनिया के अन्य रणनीतिक समुद्री मार्गों—जैसे मलक्का स्ट्रेट, स्वेज नहर और पनामा नहर—पर भी इसी तरह की मांग उठ सकती है।

यह स्थिति वैश्विक व्यापार के लिए एक नए “टोल युग” की शुरुआत कर सकती है, जहां हर समुद्री मार्ग पर शुल्क देना अनिवार्य हो जाएगा।

ईरान का यह कदम केवल एक आर्थिक प्रस्ताव नहीं, बल्कि एक रणनीतिक दांव भी माना जा रहा है। आने वाले दिनों में इस पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और कूटनीतिक बातचीत यह तय करेगी कि क्या दुनिया के समुद्री मार्ग मुक्त रहेंगे या फिर उन पर शुल्क का नया दौर शुरू होगा।

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