अजय जांगड़े 8085164784
कवर्धा।विकासखण्ड पंडरिया अंतर्गत स्थित धान उपार्जन केंद्र महीडबरा में धान के रखरखाव को लेकर जो दृश्य सामने आया, वह न केवल चौंकाने वाला था बल्कि शासन, प्रशासन और सरकारी नीतियों के प्रति की जा रही घोर लापरवाही और संभावित भ्रष्टाचार की भयावह तस्वीर भी प्रस्तुत करता है। यह स्थिति किसी शिकायत या आरोप की नहीं, बल्कि स्वयं पत्रकार द्वारा मौके पर जाकर देखी गई जमीनी हकीकत है, जो सरकारी व्यवस्था की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है।
महीडबरा धान उपार्जन केंद्र परिसर में स्पष्ट रूप से देखा गया कि धान भंडारण के लिए शासन द्वारा निर्धारित भूसे की अनिवार्य परत के स्थान पर पैरा को बोरियों में भरकर उसके ऊपर धान से भरी बोरियां करीने से सजाई गई हैं। यह व्यवस्था न केवल सरकारी दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन है, बल्कि यह दर्शाता है कि संबंधित प्रबंधक और जिम्मेदार अधिकारी नियमों को कितनी अनदेखी से नजरअंदाज कर रहे हैं।
शासन की नीति साफ है—धान को जमीन की नमी, वर्षा, शीत, कीट-पतंगों और जमीनी जीव-जंतुओं से सुरक्षित रखने के लिए पन्नी, भूसे की परत और वैज्ञानिक तरीके से भंडारण अनिवार्य है। इसके लिए शासन द्वारा सहकारी समितियों के खातों में अलग से राशि जारी की जाती है, ताकि किसी भी स्तर पर लापरवाही की गुंजाइश न रहे। इसके बावजूद महीडबरा केंद्र में धान को सीधे जमीन के संपर्क में रखकर सरकारी धन, किसानों की मेहनत और सार्वजनिक संपत्ति तीनों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
यह दृश्य किसी सामान्य भूल या तकनीकी त्रुटि का नहीं, बल्कि सुनियोजित लापरवाही और संभावित भ्रष्ट आचरण का संकेत देता है। ऐसे भंडारण से धान में नमी लगना, वजन घट जाना, गुणवत्ता खराब होना और अंततः शॉर्टेज होना तय है, जिसकी सीधी मार शासन के खजाने पर पड़ती है। करोड़ों रुपये के नुकसान की आशंका को हल्के में लेना प्रशासनिक अपराध की श्रेणी में आता है।
और सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब शासन ने पारदर्शिता के नाम पर धान उपार्जन केंद्रों में सीसीटीवी कैमरे, किसानों के लिए पेयजल, शौचालय और अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं, तब धान की मूल सुरक्षा व्यवस्था में इस स्तर की अनदेखी आखिर किसकी सहमति से की जा रही है? क्या यह सब उच्च अधिकारियों की जानकारी में हो रहा है, या फिर निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित रह गया है?
महीडबरा धान उपार्जन केंद्र में देखी गई यह स्थिति न केवल कर्तव्यहीनता की पराकाष्ठा है, बल्कि शासन और जिला प्रशासन कबीरधाम के आदेशों, प्रशिक्षणों और निर्देशों को ठेंगा दिखाने जैसा कृत्य भी है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ऐसे मामलों में जिम्मेदारों पर कभी वास्तविक कार्रवाई होगी या फिर हर साल की तरह सरकारी धन और किसानों की उपज इसी तरह लापरवाही की भेंट चढ़ती रहेगी।
अब यह पूरी तरह जिला प्रशासन कबीरधाम और राज्य सरकार पर निर्भर करता है कि वे इस खुलेआम दिख रहे प्रशासनिक पतन को गंभीरता से लेते हैं या नहीं। यदि समय रहते जांच कर दोषियों पर कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो यह मान लिया जाएगा कि ऐसी अव्यवस्थाएं मौन सहमति से फल-फूल रही हैं और जवाबदेही केवल फाइलों तक सीमित है।






