
रायपुर। हसदेव अरण्य क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई को लेकर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर गर्मा गई है। पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव द्वारा उठाए गए सवालों का समर्थन करते हुए नेता प्रतिपक्ष Dr. Charan Das Mahant ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि हसदेव अरण्य में लगभग 7 लाख पेड़ों की कटाई केवल पर्यावरणीय चिंता का विषय नहीं है, बल्कि यह विधानसभा में पारित सर्वसम्मत संकल्प की भावना के भी विपरीत है।
रायपुर में मीडिया से चर्चा करते हुए नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि राज्य विधानसभा ने पूर्व में हसदेव अरण्य और उससे जुड़े पर्यावरणीय एवं सामाजिक सरोकारों की रक्षा के लिए सर्वसम्मति से संकल्प पारित किया था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब सदन की सामूहिक भावना स्पष्ट थी, तब इतने बड़े स्तर पर पेड़ों की कटाई की अनुमति कैसे दी गई। उन्होंने कहा कि सरकार को इस विषय पर जनता के सामने स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने पहले सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत हलफनामे में कुछ खनन परियोजनाओं को आवश्यक नहीं बताया था, लेकिन अब उन्हीं क्षेत्रों में खनन गतिविधियों को बढ़ावा देने और जंगलों की कटाई पर मौन दिखाई दे रही है। उनका कहना है कि यह सरकार के रुख में विरोधाभास को दर्शाता है और इससे जनता के बीच कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि हसदेव अरण्य केवल एक वन क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह प्रदेश की जैव विविधता, प्राकृतिक संसाधनों और हजारों आदिवासी परिवारों की आजीविका का आधार है। इस क्षेत्र के जंगल, जल स्रोत और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र लंबे समय से स्थानीय समुदायों के जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। ऐसे में किसी भी विकास परियोजना के नाम पर व्यापक स्तर पर वन विनाश को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
उन्होंने रामगढ़ क्षेत्र की ऐतिहासिक पहाड़ियों, प्राकृतिक धरोहरों और आदिवासी समुदायों के जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि यदि सरकार इस मुद्दे पर संवेदनशीलता नहीं दिखाती है तो कांग्रेस पार्टी सड़कों से लेकर विधानसभा तक व्यापक जनआंदोलन चलाएगी। पार्टी पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी अधिकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाएगी।
कोयला खनन के मुद्दे पर भी नेता प्रतिपक्ष ने अपनी राय रखते हुए कहा कि ऊर्जा क्षेत्र में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा जैसे वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में देश को नई कोयला खदानों पर निर्भरता बढ़ाने के बजाय स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा स्रोतों की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि विभिन्न विशेषज्ञों और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े आकलनों के अनुसार वर्ष 2035 के बाद कोयले की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना कम है। इसके विपरीत नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग में लगातार विस्तार हो रहा है। ऐसी स्थिति में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर नई कोयला खदानों की शुरुआत करना दूरदर्शी नीति नहीं माना जा सकता।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि छत्तीसगढ़ पहले से ही देश के प्रमुख कोयला उत्पादक राज्यों में शामिल है और वर्तमान परिस्थितियों में प्रदेश में नई कोयला खदानें शुरू करने की कोई विशेष आवश्यकता दिखाई नहीं देती। उनका मानना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है तथा किसी भी निर्णय में स्थानीय लोगों की सहमति और हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
हसदेव अरण्य को लेकर जारी विवाद के बीच यह मुद्दा अब राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में इस विषय पर सरकार और विपक्ष के बीच बहस और तेज होने की संभावना है, जबकि पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी अधिकारों से जुड़े संगठनों की नजर भी इस पूरे घटनाक्रम पर बनी हुई है।





