
अजय जांगड़े
कवर्धा। जिले के परिवहन कार्यालय में ड्राइविंग लाइसेंस एवं वाहन नामांतरण जैसी आवश्यक सेवाओं को लेकर आम नागरिकों, विशेषकर युवा वर्ग, कॉलेज विद्यार्थियों एवं छात्राओं में भारी नाराजगी देखी जा रही है। आरोप है कि बिना एजेंट और बिना “चढ़ावे” के कार्यालय में फाइलें आगे नहीं बढ़ रहीं, जिससे आमजन परेशान होकर दलालों के चंगुल में फंसने को मजबूर हो रहे हैं।
स्थानीय युवाओं का कहना है कि ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने और नाम ट्रांसफर कराने की प्रक्रिया इतनी जटिल बना दी गई है कि सीधे आवेदन करने वाले लोगों को महीनों तक चक्कर काटने पड़ते हैं। एक पीड़ित युवक ने बताया कि उसने तीन माह पूर्व बिना किसी एजेंट के लाइसेंस हेतु आवेदन किया था, लेकिन उसकी फाइल सेक्शन तक पहुंचने के बाद भी लंबित रही। बाद में ड्राइविंग टेस्ट के नाम पर उससे 1000 रुपये अतिरिक्त वसूले गए, तब जाकर प्रक्रिया आगे बढ़ी।
पीड़ित युवक ने कहा कि यह समस्या केवल उसकी नहीं, बल्कि जिले के अनेक युवाओं की है, जो ईमानदारी से आवेदन करने के बावजूद कार्यालयी तंत्र की धीमी चाल और कथित वसूली व्यवस्था से जूझ रहे हैं। इससे युवाओं में सरकारी व्यवस्थाओं के प्रति विश्वास कमजोर पड़ता जा रहा है।
युवाओं और अभिभावकों का कहना है कि सरकार डिजिटल इंडिया, विकसित भारत और पारदर्शी शासन की बात करती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। यदि एक साधारण लाइसेंस या नामांतरण कार्य के लिए लोगों को महीनों भटकना पड़े और अतिरिक्त रकम देनी पड़े, तो यह व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
लोगों ने मांग की है कि ड्राइविंग लाइसेंस, नामांतरण और अन्य परिवहन सेवाओं को पूर्णतः ऑनलाइन एवं पारदर्शी बनाया जाए, ताकि आवेदकों को कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। साथ ही ड्राइविंग टेस्ट की सुविधा ब्लॉक मुख्यालयों या नजदीकी पुलिस थानों में उपलब्ध कराई जाए, जिससे ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्र के युवाओं को राहत मिल सके।
जनता ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि परिवहन कार्यालय में व्याप्त कथित दलाली, घूसखोरी और भ्रष्टाचार की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारी-कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई करते हुए सेवा से पृथक किया जाए। आमजन का कहना है कि किसी भी विभाग में बिना अंदरूनी संरक्षण के इस तरह की व्यवस्था लंबे समय तक फल-फूल नहीं सकती।
अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार विभाग और सरकार युवाओं की इस पीड़ा को सुनते हैं या फिर “चढ़ावा संस्कृति” के सामने आम नागरिक यूं ही बेबस खड़े रहेंगे।





