
चैप्टर : 2 ये धमतरी राजस्व है
यहां धारा नहीं.. दाम लगते हैं
मगरलोड तहसील में भ्रष्टाचार की स्क्रिप्ट का दूसरा चैप्टर और भी बेशर्म है। तहसीलदार भारद्वाज ने एक बार फिर कानून को रबर की तरह खींचकर अपने मनमुताबिक मोड़ दिया और एक ऐसा आदेश सुना डाला जो कागज पर तो चमकता है, लेकिन कानून की नजर में कागज का टुकड़ा भी नहीं।
ग्राम सौगा के होलेश्वर कुमार साहू ने अपनी 0.19 हेक्टेयर जमीन खसरा 540/3 का ऑनलाइन भू-नक्शा गलत बँटवारे की शिकायत की। बंदोबस्त-पूर्व कागजातों के साथ उन्होंने तहसीलदार कोर्ट में सुधार के लिए गुहार लगाई। भारद्वाज साहब ने आवेदन को “बंदोबस्त पूर्व प्रकरण” का तमगा लगाकर धारा 89 (शीर्ष अ-5) में दर्ज कर लिया, राजस्व निरीक्षक से जांच कराई और जब रिपोर्ट में लिखा आया कि काश्त-कब्जे के मुताबिक नक्शा सुधारना ठीक रहेगा, तो 11 नवंबर 2024 को फटाफट सुधार का आदेश थोक दिया।
लेकिन पूरा राजस्व महकमा हक्का-बक्का है। जिस धारा में तहसीलदार ने केस डाला, उसमें नक्शा सुधार का अधिकार ही नहीं है। अगर सिर्फ ऑनलाइन नक्शा गलत था तो धारा 115 (अ-6 अ) लगनी थी, जिसमें तहसीलदार खुद सुधार कर सकते थे। अगर स्थायी बँटवारा गलत हुआ था तो धारा 107 लगती और कलेक्टर की अनुमति जरूरी होती। पर भारद्वाज साहब ने बीच का रास्ता चुना, न कानून माना, न प्रक्रिया। सीधे वह धारा लगा दी जो नक्शा सुधार के लिए कभी इस्तेमाल ही नहीं होती।
अब मगरलोड की गलियों में एक ही बात गूंज रही है, “जब पिछली बार तीन सहखातेदारों के नाम बदलने के लिए मोटी रकम हाथ ठिठुराई गई थी, तो इस बार नक्शा सुधार का भी अच्छा दाम वसूला गया होगा। तभी तो कानून की किताब जेब में रखकर, मनमर्जी का फरमान लिख दिया।” यह आदेश जब भी ऊपरी अदालत में जाएगा, पलक झपकते ही कूड़ेदान में पहुँचेगा, लेकिन तब तक किसान को राहत भी मिल जाएगी और तहसीलदार की तिजोरी भी भर जाएगी।
लोग पूछ रहे हैं, क्या अब मगरलोड में धाराएँ नंबर से नहीं, जेब की मोटाई से लगाई जाती हैं? तहसीलदार भारद्वाज ने साबित कर दिया है कि उनके यहाँ कानून नहीं, दाम चलते हैं। अगला अध्याय कब आएगा, यह तो वक्त बताएगा, पर इतना तय है कि मगरलोड में न्याय की दुकान पूरे जोर-शोर से चल रही है।

2.ये धमतरी राजस्व है…
जहां एक नाम नहीं सुधरा, वहीं तीन नाम बदल गए!
फैसलों में ‘दोहरे मापदंड’ से राजस्व न्यायालय की साख दांव पर..
चुनेश साहू । धमतरी
जिले के राजस्व विभाग में नाम-सुधार संबंधी दो प्रकरणों पर आए विपरीत निर्णयों ने विभागीय कार्यप्रणाली को लेकर कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। तहसील कार्यालय मगरलोड के विश्वसनीय स्त्रोतों के आधार पर किसानों द्वारा लगाए गए आरोपों की गहनता को देखते हुए उच्चस्तरीय जांच की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
पहला प्रकरण ग्राम सौगा से संबंधित है, जहां आवेदक निरेश कुमार ने खसरा नंबर 259/2 एवं 87 में दर्ज नाम में सुधार हेतु आवेदन प्रस्तुत किया था। पटवारी द्वारा की गई जांच रिपोर्ट में यह उल्लेख किया गया कि रिकॉर्ड में दर्ज “शिव कुमार” और आवेदक “निरेश कुमार” एक ही व्यक्ति हैं। इसके बावजूद, प्रकरण को छत्तीसगढ़ भू-अभिलेख एवं बंदोबस्ती संहिता की धारा 115 के अंतर्गत लिपिकीय त्रुटि न मानते हुए तहसीलदार द्वारा आवेदन निरस्त कर दिया गया। इस निर्णय से आवेदक असंतुष्ट हैं और उन्होंने न्यायालयीन प्रक्रिया में असमानता का आरोप लगाया है।
इसके विपरीत, दूसरा प्रकरण ग्राम पंहदा का है, जिसमें आवेदक फूलचंद पिता सुदर्शन द्वारा तीन सह-खातेदारों के नामों—कुंतीबाई, राधाबाई और कलाबाई—के स्थान पर क्रमशः मीनाबाई, हेमबाई और गीता के नाम दर्ज करने हेतु आवेदन प्रस्तुत किया गया। जांच उपरांत सम्बंधित पटवारी की रिपोर्ट के आधार पर तहसीलदार द्वारा 24 सितंबर 2025 को नाम-सुधार का आदेश जारी किया गया।
दोनों प्रकरणों में निर्णयों के अंतर को लेकर स्थानीय स्तर पर राजस्व गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है, तथा कुछ नागरिकों ने आरोप लगाया है कि विभागीय स्तर पर निर्णयों में पारदर्शिता का अभाव है। ग्रामीणों का कहना है कि समान प्रकृति के मामलों में भिन्न-भिन्न निर्णय न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं।
सूत्रों का मानना है कि इन मामलों में विस्तृत जांच से तथ्यों की पुष्टि हो सकती है। प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि राजस्व न्यायालयों की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए इन आरोपों पर त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई आवश्यक है, ताकि जिला स्तर पर न्याय व्यवस्था के प्रति जनता का विश्वास पुनः स्थापित हो सके।





