
अजय जांगड़े 8085164784
पंडरिया। आगरपानी बस्ती में विधायक निधि से स्वीकृत लगभग १० लाख रुपए के सामुदायिक भवन का निर्माण अब सार्वजनिक आक्रोश और संदेह का विषय बन चुका है। निर्माण स्थल पर उपयोग की जा रही काली रेत, मिट्टी-मिश्रित घटिया सामग्री और मानक रेत-सेंट्रिंग की अनुपस्थिति ने भवन की मज़बूती व दीर्घायु पर व्यापक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों और स्रोतों का आरोप है कि यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि योजना बद्ध भ्रष्टाचार और विभागीय संरक्षण का विकसित रूप है।
निर्माण के मानक और स्वीकृत स्टीमेट के अनुसार उच्च गुणवत्ता वाली रेत, झड़, मानक सेंट्रिंग और उचित मिश्रण का प्रयोग आवश्यक है। मगर आगरपानी के निर्माण में मौके पर दिखाई दे रही सामग्री इन मानकों से कोसों दूर है। ग्रामीणों का कहना है कि दीवारों में उपयोग की जा रही सामग्री वर्षा और समय के साथ क्षतिग्रस्त होने का जोखिम पैदा कर रही है, जिससे सार्वजनिक धन का दुरुपयोग स्पष्ट होता है।
सूचना पटल गायब — पारदर्शिता की हत्या
सरकारी नियमों के अनुसार प्रत्येक निर्माण स्थल पर सूचना पटल अनिवार्य है, जिसमें परियोजना की लागत, निष्पादक एजेंसी, अनुबंध की अवधि और अन्य अहम जानकारियां स्पष्ट रूप से दी जाती हैं। आगरपानी स्थल पर सूचना पटल का पूर्ण अभाव यह संकेत देता है कि प्रक्रिया को जनता से छुपाकर मनमानी तरीके से कार्य कराया जा रहा है। इससे पता चलता है कि पारदर्शिता की जानबूझकर हत्या की जा रही है ताकि त्रुटिपूर्ण निर्माण को ढक कर रखा जा सके।
ग्राम पंचायत व सरपंच पर आरोप
सूत्रों की मानें तो यह निर्माण ग्राम पंचायत आगरपानी को सौंपी गई है और ग्राम पंचायत का प्रतिनिधित्व सरपंच द्वारा किया जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि सरपंच और स्थानीय निर्माण एजेंसी मिलकर मानक सामग्री की जगह सस्ते व अनुपयोगी संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं — एक ऐसा खेल जिसमें लाभ और लेन-देन की गंध स्पष्ट दिखाई देती है। इस तरह के आरोप न सिर्फ स्थानीय विश्वास को तोड़ते हैं बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख को भी कराहने पर मजबूर कर देते हैं।
R.E.S. विभाग की लापरवाही पर उठते सवाल
ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (R.E.S.) उपसंभाग पंडरिया पर भी गंभीर आरोप लग रहे हैं। तकनीकी सहायक और अनुविभागीय अधिकारी जिन्हें साइट निरीक्षण और गुणवत्ता परीक्षण करना चाहिए था, वे मौके पर अनुपस्थित रहे। स्थानीय लोग बताते हैं कि निरीक्षण रजिस्टर में खानापूर्ति और जांच के नाम पर औपचारिकताएं ही की जा रही हैं। भौतिक सत्यापन व गुणवत्ता परीक्षण के अभाव में यह पूरा कार्य विभागीय संरक्षण की छाया में निहित भ्रष्ट प्रथाओं की पुष्टि करता दिखता है।
प्रशासन की साख दांव पर
सबसे चिंताजनक पक्ष यह है कि कलेक्टर कार्यालय का प्रतिनिधि, जो निर्माण पर नजर रखे रहने का दायित्व निभाता है, उसने भी मौन साध रखा है। ग्रामीणों में यह विश्वास बन चुका है कि प्रशासनिक चुप्पी और अनदेखी ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है। इस चुप्पी के कारण शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता पर गहरा आँच आई है।
इस निर्माण का ठोस भौतिक सत्यापन, गुणवत्ता परीक्षण और परियोजना की पुन: जाँच की मांग कर रहे हैं। साथ ही वे पारदर्शिता सुनिश्चित करने हेतु सूचना पटल तत्काल लगाने और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गुहार लगा रहे हैं। यदि शासन-प्रशासन शीघ्र संज्ञान नहीं लेता है तो यह मामूली भवन भविष्य में जनहित व सार्वजनिक धन दोनों के साथ बड़ा धोखा साबित होगा।





