
कवर्धा। यह किसी विडंबना से कम नहीं कि प्रदेश के उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा के अपने गृह जिले कवर्धा में ही पुलिस व्यवस्था चरमराई पड़ी है। शासन और प्रशासन के कड़े निर्देशों के बावजूद यहां की पुलिस व्यवस्था अब जनसेवा से ज्यादा “जनउपेक्षा” का प्रतीक बन चुकी है। जनता सवाल पूछ रही है “जब उप मुख्यमंत्री के जिले में कानून-व्यवस्था का आलम ऐसा है, तो फिर बाकी जिलों की हालत का अंदाज़ा कैसे लगाया जाए?”
कवर्धा पुलिस पर आरोप है कि शिकायतों पर कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जाती है। अपराध नियंत्रण की जगह अपराधियों से सांठगांठ का माहौल बन गया है। कई मामलों में पीड़ितों की शिकायतें महीनों से थानों में धूल खा रही हैं, जबकि आरोपी खुलेआम घूमते नज़र आ रहे हैं।
जनता का कहना है कि पुलिस अब “जनसेवा” नहीं बल्कि “जनसुनवाई की नौटंकी” कर रही है। जिन थानों को न्याय का मंदिर कहा जाता था, वहां अब सिफारिश और पहचान का सिक्का चलता है। पीड़ित चाहे कितना भी पुकारे, जब तक राजनीतिक दबाव या ऊंची पहुंच न हो, तब तक पुलिस के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।
लोगों में तंज भरा सवाल गूंज रहा है — “जब घर का पहरेदार ही सो जाए, तो चोरों से सुरक्षा की उम्मीद कैसे की जाए?” यही स्थिति अब कवर्धा की हो चुकी है, जहां पुलिस बेखौफ़ अपराधियों के सामने झुकी दिखती है और पीड़ित न्याय की गुहार लगाते-लगाते थक जाते हैं।
उप मुख्यमंत्री के गृह जिले में इस तरह की लचर कानून-व्यवस्था ने शासन की छवि पर भी सवालिया निशान लगा दिया है। अगर “घर का हाल” ही ऐसा है, तो “राज्य का हाल” समझने में किसी को देर नहीं लगती। जनता अब सीधा संदेश दे रही है । “उप मुख्यमंत्री जी, सुधार की शुरुआत अपने घर से कीजिए! कवर्धा की पुलिस व्यवस्था को आईना दिखाने का वक्त आ गया है।”





