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दर्री में वर्षों बाद गूंजा रंगमंच*: *मौरध्वज (शेर का भोजन) नाटक*का हुआ भव्य मंचन*

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में धमतरी खंड के परसुली मंडल के अंतर्गत ग्राम डोंगेश्वर धाम देवपुर में शताब्दी वर्ष का कार्यक्रम दिनांक मनाया गया जिसमें परसुली मंडल के स्वयंसेवकों ने अनुशासित ढंग से पथ संचलन किया इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता श्री हरिओम शर्मा जी कुटुंब प्रबोधन प्रमुख छत्तीसगढ़ थे कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री दयाराम साहू जी पूर्व प्रदेश महामंत्री साहू समाज छत्तीसगढ़ ने की एवं सैंकड़ो स्वयंसेवकों ने राष्ट्रभक्ति के साथ पूरे ग्राम में पथ संचलन किया तथा गांव के माहौल को राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत कर दिया।

ओ इस कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉक्टर अजय साहू खंड कार्यवाह, श्री पदमन साहू मंडल कार्यवाह ,श्री गौतम साहू विभाग शारीरिक प्रमुख राजीम विभाग, दिलीप साहू डॉक्टर गोपी कृष्णा साहू , नेमचंद साहू चेतन यदु पूर्व सरपंच , प्रीतम साहू, जय प्रकाश साहू , तिलक राम साहू ,देवलाल साहू सरपंच ,डॉ रामकृष्ण साहू , दीपेश यदु, घनानंद निषाद आदि का विशेष योगदान रहा।

 

2.*दर्री में वर्षों बाद गूंजा रंगमंच*:

 

*मौरध्वज (शेर का भोजन) नाटक*का हुआ भव्य मंचन*

 

*पुराने व नए कलाकारों की सहभागिता से ग्रामीण संस्कृति को मिला नया आयाम*

 

*दर्री (खरेंगा)*। आधुनिक युग की टीवी, मोबाइल और यूट्यूब की चकाचौंध से दूर, ग्राम दर्री में वर्षों बाद रंगमंच की विधा ने फिर से अपनी चमक बिखेरी। स्वतंत्र बाल समाज नाट्य मंडली दर्री द्वारा आयोजित भव्य नाट्य मंचन ‘मौरध्वज उर्फ शेर का भोजन’ ने न केवल दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया, बल्कि ग्रामीण सांस्कृतिक चेतना को भी एक नया जीवन दिया।

यह नाटक प्रसिद्ध नाटककार नथाराम गौड़ शर्मा “हाथरस” (उत्तर प्रदेश) द्वारा रचित एक संगीत प्रधान पौराणिक नाट्य कृति है, जिसमें वीर रस, रौद्र रस, हास्य, विलाप आदि भावों को विभिन्न शास्त्रीय और लोक संगीत की तर्ज़ों में प्रस्तुत किया गया। नाटक में दोहा, सोरठा, चौपाई, छंद, बहरत, दादरा,लावणी, ल.र.ब. स., आसावरी, मसन्वी, ठुमरी, कवाली, कलांगड़ा, ग़ज़ल जैसी कई तर्जों का प्रयोग कर संवादों और भावनाओं की गहराई को दर्शाया गया, जिससे मंचन अत्यंत प्रभावशाली बन पड़ा। यह शैली भारत की समृद्ध नाट्य परंपरा की एक अनुपम झलक है, जिसे दर्री की नाट्य मंडली ने बड़े सम्मान और कला-निष्ठा के साथ सहेज कर प्रस्तुत किया।

 

*कलाकारों की प्रस्तुति और सांस्कृतिक समन्वय*

 

इस आयोजन की खास बात यह रही कि इसमें पुराने अनुभवी कलाकारों और नई पीढ़ी के नवोदित कलाकारों ने कंधे से कंधा मिलाकर अभिनय किया। इस समन्वय ने मंच को न सिर्फ जीवंत किया, बल्कि गाँव के भीतर कला और सांस्कृतिक चेतना को भी पुनर्जीवित किया।

 

*मुख्य कलाकारों में शामिल रहे*: चैन सिंह चक्रधारी, अशोक साहू, दुर्योधन साहू, राजकुमार चक्रधारी, मनोहर चक्रधारी, रविशंकर कुंभकार, नारद, महेंद्र, चुम्मन खोमेश, गोलू।

 

*संगीत पक्ष की आत्मा रहे*: श्री दशरथ साहू, भीष्म शुक्ला, शंकर दास मानिकपुरी, प्रकाश चक्रधारी और गीतेश चक्रधारी — जिनके निर्देशन में संगीत ने मंचन को सजीव कर दिया।

 

*मंच के पीछे पर्दे की बागडोर* संभाली: नंदकुमार कुंभकार, उमेंद्र, इंद्रावण, सहदेव, खूबलाल साहू, माखन यादव, घनश्याम चक्रधारी, राकेश, उपेन्द्र, राहुल ने।

 

*साउंड व लाइटिंग का संचालन* किया: योगेश साउंड (दर्री), तमेश साहू व छत्रपाल साहू ने, जिन्होंने तकनीकी पक्ष को बखूबी संभाला।

 

*आस्था, परंपरा और समर्पण का प्रतीक बना यह आयोजन*

 

*कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे* –

 

श्री दयाराम साहू (पूर्व महामंत्री, प्रदेश साहू संघ),

 

श्री हिमांशु शेखर साहू (सरपंच),

 

श्री निरंजन साहू (उपसरपंच),

 

श्री अर्जुन दास, ललित शुक्ला एवं समस्त पंचगण।

 

 

*गांव के सैकड़ों ग्रामीणों की उपस्थिति ने इस आयोजन को एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक उत्सव में बदल दिया*।

 

*80 वर्ष की उम्र में भी अभिनय का जज़्बा*

 

विशेष उल्लेखनीय प्रस्तुति रही 80 वर्षीय श्री दशरथ साहू की, जिन्होंने बिना चश्मे के “टीका कार” की भूमिका निभाई। उन्होंने पुरानी कवि शैली में संवाद प्रस्तुत कर दर्शकों को भावविभोर कर दिया और यह संदेश दिया कि कला की कोई उम्र नहीं होती।

 

*सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेज़ बन रहा यह मंचन*

 

*इस नाट्य प्रस्तुति की वीडियोग्राफी* RK Studio (गुंडरदेही) एवं DKS Studio (दर्री) द्वारा की गई, जिसे यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया जाएगा ताकि ग्राम्य संस्कृति और परंपरा की यह अनुपम झलक व्यापक जनमानस तक पहुँच सके।

 

 

गांव में नाट्य कला का यह आयोजन सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण साबित हुआ। यह मंचन हमारे पूर्वजों की विरासत को संजोने और अगली पीढ़ी को सौंपने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। दर्री जैसे गांवों में जब सांस्कृतिक दीप पुनः प्रज्वलित होते हैं, तो वह सिर्फ गांव नहीं, बल्कि पूरी सभ्यता को रोशन करते हैं।

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