
धमतरी शहर की सियासत में एक बार फिर परिवारवाद का रंग गहराता नजर आ रहा है। शहर के एक बड़े नेता अपने बेटे को राजनीतिक अखाड़े में उतारने की जोर-शोर से तैयारी में जुटे हैं। आगामी त्योहारों से पहले समर्थकों का जमावड़ा शुरू हो चुका है, और लॉन्चिंग ग्राउंड तैयार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही। लेकिन अब एक नए बैनर तले नेता पुत्र को सियासी मंच पर चमकाने की रणनीति बन चुकी है।

यह कोई नई बात नहीं है। सत्तासीन हो या विपक्ष, दोनों ही अपनी वंशावली को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाने में माहिर हैं। आम कार्यकर्ता, जो दिन-रात मेहनत कर झंडे उठाता और दरी बिछाता है, उसे सिर्फ तालियां बजाने और भीड़ जुटाने तक सीमित रखा जाता है। शीर्ष नेता कूटनीति के दम पर अपने बेटों-भतीजों को सत्ता का उत्तराधिकारी बनाते हैं, मानो राजनीति कोई जागीर हो। “राजा का बेटा ही राजा बनेगा” का यह दस्तूर धमतरी की सियासत में भी साफ दिखता है।

योग्यता, मेहनत और लगन की बातें तो सिर्फ भाषणों तक सीमित हैं। हकीकत में नेताओं का मकसद अपने परिवार को मोटी कमाई और ऐशोआराम की जिंदगी देना है। कार्यकर्ताओं की आकांक्षाएं कुचलकर, उनकी मेहनत को महज सीढ़ी बनाकर ये नेता अपने वंश को सियासत की चोटी पर बिठाते हैं। धमतरी का यह ताजा घटनाक्रम फिर वही सवाल उठाता है—क्या सियासत में आम कार्यकर्ता का कोई भविष्य है, या यह सिर्फ परिवारवाद का खेल है?
चुनेश साहू 7049466638





