
धमतरी/रायपुर
जिला प्रशासन इन दिनों किसी अखाड़े से कम नहीं, जहां असली मुकाबला कानून और कमीशन के बीच चल रहा है। एक ओर हैं IAS अधिकारी – जिनके कंधों पर शासन-प्रशासन का बोझ है, और दूसरी ओर एक मामूली संविदा कर्मी – जो नाम का तो अस्थायी है, पर असल में पूरे तंत्र का “अनौपचारिक बादशाह” बन बैठा है।
✍️ कलम की जगह जंग
कभी IAS की कलम फैसलों की बिजली गिराती थी, अब वही कलम फाइलों में जंग खाए पड़ी है। कार्रवाई की स्याही मानो सूख चुकी है। प्रशासनिक ताकत की कलम अब चुपचाप कोने में पड़ी है, जबकि संविदा कर्मी का “कमीशन पेन” हर ठेके और हर सेंशन पर मोटी रकम लिख रहा है।
यह संविदा कर्मी ठेकेदारों से कमीशन वसूलता है और उसे अपना निजी महल सजाने में उड़ेलता है।
हर सेंशन = मोटा कमीशन
हर ठेके = मोटी रकम
हर फाइल = संविदा कर्मी का इशारा

यह खेल इतना पारदर्शी हो गया है कि अब इसे छुपाने की भी कोशिश नहीं होती। ठेकेदार कहते हैं – “काम कराना है तो IAS के पास मत जाओ, सीधा संविदा कर्मी के दरबार जाओ।”

IAS की खामोशी : मजबूरी या मिलीभगत?
IAS की चुप्पी अब रहस्य नहीं, मज़ाक बन चुकी है। जनता पूछ रही है –
“क्या IAS अधिकारी कमीशन के महल की नींव में अपनी चुप्पी का पत्थर जोड़ रहे हैं?”
“क्या उनकी कलम की स्याही सूख गई है, या फिर उसमें कमीशन का रंग घुल चुका है?”
“कहीं ऐसा तो नहीं कि संविदा कर्मी से उठी मलाई का प्याला ऊपर तक पहुंच रहा है?”
संविदा कर्मी का दरबार
आज हालत यह है कि जिला पंचायत का असली ताज IAS के सिर पर नहीं, बल्कि संविदा कर्मी की जेब में चमक रहा है।अधिकारी बन गए कठपुतली,सेठानी हो गईं मूक दर्शक,और पूरा जिला प्रशासन संविदा कर्मी के इशारों पर नाच रहा

नतीजा – सत्ता का पलड़ा झुका
अब सवाल नहीं रहा कि किसका पलड़ा भारी है। तस्वीर साफ है – IAS अधिकारी सिर्फ “नाम के शेर” रह गए हैं, जबकि संविदा कर्मी खुलेआम “जिला पंचायत का राजा” बन गया है।
जब तक जंग खाई कलम की स्याही में कार्रवाई का साहस नहीं उतरता, तब तक यह खेल यूं ही चलेगा। और जनता? वह बस यही कह रही है –
“IAS बनाम संविदा कर्मी की जंग में, हार रहा है प्रशासन और जीत रहा है कमीशन।”
चुनेश साहू,7049466638





