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स्वतंत्रता दिवस विशेष* छत्तीसगढ का मंगल पाण्डे लश्कर हनुमान सिंह*

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*स्वतंत्रता दिवस विशेष*

*छत्तीसगढ का मंगल पाण्डे लश्कर हनुमान सिंह*
धनंजय राठौर
संयुक्त संचालक,
जनसंपर्क संचालनालय, रायपुर

1857 के विद्रोह को कई नामों से जाना जाता है, जिनमें भारतीय विद्रोह, सिपाही विद्रोह, 1857 का महान विद्रोह, भारतीय विद्रोह और भारतीय स्वतंत्रता का पहला युद्ध शामिल है। 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक, ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के बड़े हिस्से को अपने नियंत्रण में ले लिया था। सन 1757 में प्लासी की की लड़ाई के सौ साल बाद, अन्यायी और दमनकारी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ गुस्से ने एक विद्रोह का रूप ले लिया, जिसने भारत में ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। जहां ब्रिटिश इतिहासकारों ने इसे सिपाही विद्रोह कहा, वहीं भारतीय इतिहासकारों ने इसे 1857 का विद्रोह या भारतीय स्वतंत्रता का पहला संग्राम नाम दिया। 1857 के विद्रोह से पहले अठारहवीं शताब्दी के अंत से देश के विभिन्न हिस्सों में अशांति की एक श्रृंखला शुरू हो गई थी।

छत्तीसगढ़ की माटी में कई वीर सपूतों ने जन्म लिया है. यहां के वीरों ने आजादी की लड़ाई के लिए अपने खून की नदियां तक बहाई हैं. इसकी गवाही शहर की कई इमारतें और सड़कें दे रहीं हैं. इसी में से एक है राजधानी रायपुर के बीचों बीच स्थित पुलिस परेड ग्राउंड। छत्तीसगढ़ में भी भारत की तरह बहुत से जगह अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज बुलंद हुए थे, जिसमें बहुत से स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने भाग लिया था, बहुत से स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपनी अमूल्य योगदान देश की आजादी में दिए है जिनको भुला पाना हमारे लिए नामुमकिन है, इनमें से एक थे ठाकुर हनुमान सिंह (Hanuman singh from chhattisgarh) इनके सेवाभाव और समर्पण को हम सब का नमन इन्ही लोगों के कारण ही हम सब आज स्वतंत्र जीवन व्यतीत कर रहे हैं इन स्वतंत्रता सेनानियों की हम हमेशा आभारी रहेंगे।

ठाकुर हनुमान सिंह के जन्म और मृत्यु के सम्बन्ध में कोई भी प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती किंतु हनुमान सिंह सम्बन्ध में अंग्रेज अधिकारियों के द्वारा तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के समक्ष प्रस्तुत प्रतिवेदन के अनुसार वे बैसवाड़ा के राजपूत थे और वर्ष 1858 ई. में उनकी आयु 35 वर्ष थी। अर्थात् उनका जन्म वर्ष 1823 ई. माना जा सकता है।

नागपुर का अस्थाई सैनिक दल जो रायपुर में स्थित था, उसकी तीसरी टुकड़ी में वीर हनुमान सिंह मैगजीन लश्कर के पद पर नियुक्त थे। लेफ्टिनेंट स्मिथ ने वीर हनुमान सिंह की कद काठी का विवरण निम्नानुसार दिया था। वह सुगठित कद का साफ और गोल चेहरे वाला बड़ी आंखें ऊंचा मस्तक छोटी गर्दन बड़ी और रोबदार मूछ वाला था तेज आवाज में बोलता था लेकिन शांत प्रकृति का था और चलते समय नीची निगाह रखता था और बैसवारे का रहने वाला था।

कैप्टन सिडवेल के नेतृत्व में नागपुर से 100 सैनिकों की अंग्रेजी पल्टन को छत्तीसगढ़ में विद्रोह दबाने के लिए रायपुर भेजा गया था। इसी पल्टन में बैसवारे के वीर हनुमान सिंह मैगजीन लश्कर के रूप में शामिल थे। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के महानायक पहाड़ी अंचल सोनाखान के जमींदर वीर नारायण सिंह को 10 दिसंबर 1857 को खुलेआम रायपुर के प्रमुख चौराहे पर फांसी दिया गया। वीर और छत्तीसगढ़ अंचल में महाविद्रोह को दबाने की चेष्टा अंग्रेज हुकूमत ने की थी।

अंग्रेजों ने यह मान लिया था कि अब छत्तीसगढ़ अंचल में विद्रोह नहीं होगा लेकिन उन्हें यह अंदाज नहीं था कि क्रांति की ज्वाला उनके अपने सैन्य शिविर में ही धधक रही है। वीर नारायण सिंह की शहादत पर वीर हनुमान सिंह का खून खौल उठा और बदला लेने के लिए ही उन्होंने 18 जनवरी 1858 की रात अपने दो साथियों की मदद से कैप्टन सिडवेल को तलवार से 9 वार करके मौत की नींद सुला दिया था।

सिडवेल को मारने के बाद वीर हनुमान सिंह ने सैन्य शिविर में घूम घूम कर बदला लेने का ऐलान किया और भारतीय सिपाहियों को विद्रोह में शामिल होने के लिए खुले रुप में साथ देने के लिए ललकारा लेकिन कोई दूसरा सिपाही उनकी जैसी हिम्मत नहीं जुटा पाया। सिडवेल की हत्या के बाद अंग्रेजी सेना के शिविर में हड़कंप मच गया। अंग्रेजी सेना ने हनुमान सिंह का साथ देने वाले दोनों सिपाहियों को पकड़ लिया लेकिन वीर हनुमान सिंह साथियों का साथ ना मिलने पर छत्तीसगढ़ अंचल के पहाड़ी जंगलों में छिप गए।

रायपुर में उस समय फौजी छावनी थी जिसे तीसरी रेगुलर रेजीमेंटश् का नाम दिया गया था। ठाकुर हनुमान सिंह इसी फौज में मैग्जीन लश्कर के पद पर नियुक्त थे। सन् 1857 में उनकी आयु 35 वर्ष की थी। विदेशी हुकूमत के प्रति घृणा और गुस्सा था। रायपुर में तृतीय रेजीमेंट का फौजी अफसर था सार्जेंट मेजर सिडवेल। दिनांक 18 जनवरी 1858 को रात्रि 7:30 बजे हनुमान सिंह अपने साथ दो सैनिकों को लेकर देशी पैदल सेना की थर्ड रेजीमेण्ट के सार्जेण्ट मेजर सिडवेल उस समय अपने कक्ष में अकेले बैठे आराम कर रहे थे। हनुमान सिंह कमरे में निर्भीकतापूर्वक घुस गए तथा तलवार से सिडवेल पर घातक प्रहार किये और उनकी हत्या कर दी।

हनुमान सिंह के साथ तोपखाने के सिपाही और कुछ अन्य सिपाही भी आये। उन्हीं को लेकर वह आयुधशाला की ओर बढ़े और उसकी रक्षा में नियुक्त हवलदार से चाबी छीन ली। बन्दूको में कारतूस भरे। दुर्भाग्यवश फौज के सभी सिपाही उसके आवाहन पर आगे नहीं आये। इसी बीच सिडवेल की हत्या का समाचार पूरी छावनी में फैल चुका था। लेफ्टिनेन्ट रैवट और लेफ्टिनेन्ट सी.एच.एच. लूसी स्थिति पर काबू पाने के लिये प्रयत्न करने लगे। हनुमान सिंह और उसके साथियों को चारों ओर से घेर लिया गया।

इसके बाद वह छावनी पहुंचे। उन्होंने अन्य सिपाहियों को भी इस विद्रोह में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया। सभी सिपाहियों ने उनका साथ नहीं दिया। सिडबेल की हत्या का समाचार फैल चुका था और अंग्रेज अधिकारी सतर्क हो गए। लेफ्टिनेन्ट रैवट और लेफ्टिनेन्ट सी.एच.एच. लूसी स्थिति पर काबू पाने के लिये प्रयत्न करने लगे। हनुमान सिंह और उसके साथियों को चारों ओर से घेर लिया गया।

हनुमान सिंह और उनके साथी 6-7 घंटे तक अंग्रेजों का डटकर मुकाबला करते रहे। इन 17 शहीदों में सभी जाति और धर्म के लोग थे, जिनके नाम हैं:- बल्ली दुबे (सिपाही), लल्ला सिंह (सिपाही), बुद्धु (सिपाही),पन्नालाल (सिपाही), शिव गोविंद (सिपाही) और देवीदीन (सिपाही), मातादीन (सिपाही), ठाकुर सिंह (सिपाही), अकबर हुसैन (सिपाही), दुर्गाप्रसाद (सिपाही), नाजर मोहम्मद (सिपाही), परमानंद (सिपाही), शोभाराम (सिपाही), गाजी खान (हवलदार), अब्दुल हयात (गोलंदाज), मुल्लू (गोलंदाज), शिवरी नारायण (गोलंदाज) मौका देखकर हनुमान सिंह भाग निकले लेकिन उनके 17 साथी अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए। इन पर मुकदमा चलाया गया और मृत्युदण्ड दिया गया 22 जनवरी, 1858 को सभी सिपाहियों की उपस्थिति में इन्हें फाँसी पर लटका दिया गया।

सिडवेल की हत्या के बाद भी वीर हनुमान सिंह का अंग्रेजों से बदला लेने का जज्बा कम नहीं हुआ। 2 दिन बाद 20 जनवरी 1858 की आधी रात को वीर हनुमान सिंह तलवार लेकर अकेले ही शेर की मांद में शेर के शिकार का जज्बा रखते हुए रायपुर के डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट चार्ल्स इलियट की हत्या के इरादे से उसके बंगले में घुसे और इलियट जिस कमरे में सो रहे थे, उसका दरवाजा तोड़ने का प्रयास किया लेकिन दरवाजे के मजबूत होने से प्रयास असफल रहा। इसके बाद अपनी खून की प्यासी तलवार के साथ वीर हनुमान सिंह छत्तीसगढ़ के जंगलों और पहाड़ों में गुम हो गए। उसके बाद उनका कोई भी पता नहीं चला। चार्ल्स इलियट के आदेश पर ही वीर नारायण सिंह को रायपुर के चौराहे पर तोपों से उड़ा दिया गया था। इसीलिए वीर हनुमान सिंह इलियट को भी मार डालना चाहते थे, लेकिन उनके मजबूत इरादों पर एलियट के बंगले के मजबूत दरवाजों ने पानी फेर दिया।

अंग्रेज हुकूमत ने उनको पकड़ने के लिए हजारों जासूसों और गुप्तचरों का जाल बिछाया। रुपए 500 का इनाम भी घोषित किया (यह आज के 5 लाख रुपए से ज्यादा ही है) लेकिन अंग्रेज सेना वीर हनुमान सिंह को पकड़ने में कभी भी कामयाब नहीं हो सकी। बैसवारे के महानायक राना बेनी माधव बक्श सिंह की तरह ही वीर हनुमान सिंह भी अंग्रेजों के हत्थे नहीं चढ़े। राना बेनी माधव की तरह बाकी का जीवन उन्होंने जंगलों-पहाड़ों में ही गुजार कर जीवन लीला पूरी की। रायपुर के डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट चार्ल्स इलियट के साथ उस रात बंगले में ही सोए हुए लेफ्टिनेंट स्मिथ ने उस रात के भयानक मंजर के बारे में लिखा भी-“यदि उस रात हम लोग जगाए ना गए होते तो लेफ्टिनेंट इलियट और मैं तो सोए सोए ही काट डाले गए होते और बंगले के अंदर अन्य निवासियों का भी यही हाल हुआ होता।”
*छत्तीसगढ का “मंगल पाण्डे”*

हनुमान सिंह भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी थे जिनको (chhattisgarh’s mangal pandey) ‘छत्तीसगढ का मंगल पाण्डे’ कहा जाता है। 18 जनवरी 1858 को उन्होने सार्जेंट मेजर सिडवेल की हत्या कर दी थी जो रायपुर के तृतीय रेजीमेंट का फौजी अफसर था।

कैप्टन स्मिथ के बयान से पता चलता है कि हनुमान सिंह ने छावनी में विद्रोह के दो दिन बाद ही 20 जनवरी, 1858 की रात डिप्टी कमिश्नर के बंगले पर भी हमला करने की कोशिश की थी। उस समय बंगले में क्षेत्र के कई प्रमुख वरिष्ठ अधिकारी सो रहे थे। इन अधिकारियों की सुरक्षा के लिए नियुक्त कैप्टन स्मिथ के ठीक समय पर जाग जाने से हनुमान सिंह को यहाँ से भागना पड़ा। अंग्रेज सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के लिए 500 रुपए के नगद पुरस्कार की घोषणा की थी, पर गिरफ्तार नहीं किया जा सका। हनुमान सिंह के फरार होने की इस घटना के बाद उनका कोई विवरण प्राप्त नहीं होता। कैप्टन स्मिथ के अनुसार जिस प्रकार हनुमान सिंह ने डिप्टी कमिश्नर के बंगले पर साहसपूर्ण आक्रमण किया, यदि उसे अपने उद्देश्य में सफलता मिल जाती तो निश्चय ही अंग्रेजी हुकूमत के अधिकारियों का इस शहर से सफाया हो जाता।

*रायपुर का पुलिस परेड ग्राउंड थी अंग्रेजी सेना की छावनी:-*

छत्तीसगढ़ की राजधानी मे स्थित ऐतिहासिक पुलिस परेड मैदान आजादी की लड़ाई के लिए विख्यात है। इसी मैदान में छत्तीसगढ़ में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की लड़ाई लड़ी गई। इतिहासकार डा. रमेंद्रनाथ मिश्र ने बताया कि छत्तीसगढ़ में अंग्रेज 1854 में पहुंचे। पुलिस परेड ग्राउंड को अंग्रेजी सेना की छावनी बनाया गया था। सैकड़ों अंग्रेजी सेना घुड़सवार, गनमैन समेत अन्य सैनिकों के दल रहा करते थे। तब छत्तीसगढ़ के क्रांतिकारियों ने 1857 में अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ बिंगुल फूंक दिया। इसी मैदान में 18 जनवरी 1858 को हनुमान सिंह अपने 17 साथियों के साथ अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए प्लानिंग तैयार की। जैसे ही अंग्रेज अधिकारियों को देखते ही खूनी हुंकार भरी।

छत्तीसगढ़ में 1857 के विद्रोह की विफलता का कारण:-

चूँकि भारतीय की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत सबसे पहले मेरठ से हुई थी, बाद में यह भारत के अनेकों हिस्सों में फैल गई लेकिन उस समय संचार की एक बड़ी समस्या थी, इसलिए यह क्रांति की विफलता का एक मुख्य कारण है।

कोई खास नेता नहीं था, केंद्रीय नेतृत्व का अभाव भी एक कारण था और पूरे भारत में इसका व्यापक प्रसार नहीं हो पाना भी एक कारण था।

चूंकि भारत अंग्रेजों का गुलाम बन गया था इसलिए उनके पास उनसे लड़ने के लिए उतना पैसा और हथियार भी नहीं थे। हालाँकि अंग्रेजों के पास बहुत उन्नत प्रकार के हथियार थे और वित्त भी अच्छा था। विद्रोहियों में योजना का अभाव था। वीर हनुमान सिंह छत्तीसगढ़ में सन 1857 की क्रांति के अग्रणी नायकों में गिने-माने जाते हैं। इतिहासकार मानते हैं कि अगर अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाहियों ने साथ दिया होता तो वीर हनुमान सिंह की बहादुरी से छत्तीसगढ़ अंचल में एक बार फिर क्रांति की ज्वाला भड़क उठती। अंग्रेजों को छत्तीसगढ़ छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता।

1857 की क्रांति के इस गुमनाम योद्धा ने छत्तीसगढ़ अंचल में अकेले ही क्रांति की लौ जलाकर अपना और बैसवारे का नाम इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया। समय रहते समाज और सरकार की ओर से वीर हनुमान सिंह के इतिहास को ढूंढने का उद्यम किया जाता, तो आज वह अपने बैसवारे में ही गुमनाम न होते। होना तो यह चाहिए था कि 18 जनवरी (अंग्रेजी सैन्य अफसर सिडवेल की हत्या की तारीख) को उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ अंचल में शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता।
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2.*बस्तर में भी गूंजा था स्वतंत्रता के गीत*

                                                               

               आज देश स्वतंत्रता के अठहत्तरसाल पूरे करके उनहत्तरवें वर्ष में प्रवेश करके आज सालगिरह मना रहा है | किन्तु क्या इस स्वतंत्रता के पीछे जिन महान देशभक्तों का संघर्ष रहा है उन्हें यूँ ही भुला दिया जाए ? नहीं शायद इसी बात को लेकर हमारा नेतृत्व आज जाग्रत है कि हम उन वीरों का स्मरण करें जिन्होंने हमें यह स्वतन्त्र और सुखमय जीवन देने के लिए संघर्ष किया और अपने प्राणों का उत्सर्ग किया | स्वतंत्रता के संघर्ष में जिन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपना योगदान दिया उनका पुण्य स्मरण करने का वर्ष है यह | देश जब स्वतंत्रता पाने के लिए संघर्ष कर रहा था तब उसकी आँच बस्तर में भी पहुँच चुकी थी | यहाँ लोग पहले से ही मराठों के आतंक से त्रस्त थे उस पर अंग्रेजी शासन का आना और क्षेत्रीय राजा-महाराजाओं जमींदारों पर नए-नए कानून लागू कर उनका शोषण किया जाना, अंग्रेजों को गाँव के ग्रामीणों से, उनकी तकलीफों से, कोई सरोकार नहीं था यदि था तो केवल उन पर अनावश्यक कर का बोझ लादना या फिर गुलामी के बोझ तले अपनी आज्ञा का अनुसरण करवाना, जिससे गरीब जनता आहत होने लगी उनके जुल्मों से दुखी और भयभीत होने लगी तब ऐसे समय में इस स्वतंत्रता के संघर्ष में बस्तर भी प्रभावित हुए बिना न रह सका था |

बस्तर में इसके पूर्व भी आग सुलग रही थी स्वतन्त्र होने के लिए, आतताईयों से छुटकारा पाने के लिए क्योंकि अंग्रेजों से पूर्व वैसे भी मराठा शासकों के अत्याचारों से बस्तर का क्षेत्र प्रभावित होकर त्रस्त था ही उस पर अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों ने आग में घी का काम किया और तब अंग्रेजों के दमनकारी नीतियों के खिलाफ आन्दोलन की शुरुवात 1825 में परलकोट के जमींदार गेंदसिंह ने किया था अपने साथियों के साथ मिलकर | यह आन्दोलन लगभग पाँच से छै सालों तक चला और आखिर अंग्रेजों से कठिन संघर्ष करते हुए वे अंग्रेजों की चाल के आगे असफल हो गए और गिरफ्तार कर लिए गए और 20 जनवरी 1825 में परलकोट स्थित महल के सामने उन्हें फाँसी दे दी गई थी | आज गेंदसिंह को शहीद गेंदसिंह के नाम से जाना जाता है | 

यह आग अभी थमी नहीं थी तब से लेकर भीतर ही भीतर सुलग रही थी | बस्तर के राजा-महाराजाओं को अंग्रेजों की कुटिल चाल ज़रा भी नहीं भाती थी | यह वह दौर था जब राज घराने की प्रत्येक गतिविधियों पर अंग्रेजों की नजर रहती थी फिर भी रानी ने अंग्रेजों के विरूद्ध संगठित हो रहे विद्रोहियों का न केवल साथ दिया अपितु अपने ओजस्वी भाषणों से विद्रोहियों में जोश और साहस का संचार करती रही थीं। 

                रानी सुवर्ण कुमारी ने ही सर्वप्रथम अंतागढ़ के तोड़ोकी में आम सभा को संबोधित करते हुए मुरिया राज की स्थापना का शंखनाद किया जिससे उपस्थित जन समूह में आजादी के लिए ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का स्वर मुखरित हुआ। लाल कालेन्द्र के साथ मिलकर रानी ने प्रतीकों का विस्तार किया। रूद्रप्रताप देव 1903 में बालिग हो चुके थे किंतु टालमटोल करते हुए ब्रिटिश प्रशासन ने उन्हें 1908 में विधिवत राजा घोषित किया। राजा रूद्रप्रताप देव अपनी सौतेली माँ यानि महारानी सुवर्ण कुमारी अर्थात सुबरन कुँवर और चाचा लाल कालेन्द्र से बहुत डरते थे। इस बात का फायदा उठाकर अंग्रेज फूट डालने में सफल हुए किंतु सुवर्ण कुमारी और लाल कालेन्द्र सिंह उनकी इस चाल को समझ गए थे। 

उनकी यह लड़ाई बस्तर के हित के लिए थी, बस्तर की जनता के लिए, बस्तर के लोगों के आत्म सम्मान की रक्षा के लिए, बेटियों को शोषण से बचाने के लिए, जनता को नर संहार को बचाने के लिए और अंग्रेज मुक्त बस्तर करने के लिए थी। वे जानती थीं सामने ब्रिटिश सेना गोला-बारूद, बंदूक से तैयार है और उनके राज्य के वीरों के पास मात्र तीर, कमान और भाला का ही अस्त्र है फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी एक महिला होकर भी अदम्य साहस का परिचय देते हुए डटी रहीं। उन्होंने अंग्रेजों की गुलामी, उनके दबाव में सत्ता सुख की चाह त्याग कर शोषित पीड़ित मानवता का साथ दिया |

 महारानी सुवर्ण कुमारी और चाचा लाल कालेन्द्र एक अच्छे नेतृत्व की तलाश में थे और उनकी तलाश दक्षिण बस्तर के युवा जुझारू देशभक्त गुंडाधुर के रूप में पूरी हुई | अंतागढ़ के ग्राम तोड़ोकी में सन 1910 जब वीर गुंडाधुर ने अपने साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ आजादी के युद्ध का शंखनाद किया था | गुंडाधुर के नेतृत्व में जो लड़ाई लड़ी गई उसे भूमकाल के नाम से जाना जाता है शायद इसलिए इनके गीतों में इस तरह के स्वतंत्रता के भावों का समावेश हुआ है |10 फरवरी को आज भी गुंडाधुर के नाम से भूमकाल दिवस के रूप में मनाया जाता है |

 गुंडाधुर के साहस की कहानी तो इनके लोक गीतों में होते ही हैं किन्तु जब भूमकाल के समय के गीतों को रात के सन्नाटे में ये गातें है तो लोगों के बदन में सिहरन सी दौड़ जाती है | इनके द्वारा उस समय के गाए गीतों की बानगी यहाँ प्रस्तुत है जिसे युवतियों द्वारा गाया गया है | जिस तरह हमने वन्दे मातरम और अन्य आजादी के गीतों के माध्यम से देश को आजाद कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उसी तरह बस्तर में भी गूंजे थे स्वतंत्रता के गीत इसके लिए घोटुल गुड़ी सबसे अच्छा माध्यम था | जो भी कार्य करना हो उसकी परिणिति के लिए घोटुल गुड़ी के सदस्य सलाह मशवरा करके नियम बनाकर सभी कुछ तय करते थे, उसी घोटुल गुड़ी से निकलकर कुछ गीत गाए गए जो हमें आज पढ़ने को मिलते हैं | मैं युवतियों द्वारा गाए गए कुछ हल्बी गीतों को हिंदी अनुवाद के रूप में प्रस्तुत कर रही हूँ इनके गीतों में एक भय तो व्याप्त है उन्होंने इस गीत में भगवान् श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण को भी अपने गीतों का पात्र बनाया है —

 हल्बी गीत में वे कहती हैं कि—-

दीदी री दीदी, दुलोसा दीदी, बेलोसा दीदी –

रानी री रानी बेलोसा रानी, दुलोसा देवानिन 

दादा(भाई) लोगों ने बताया हमें कि इस जगह पर 

माता सीता कभी आईं थी यहाँ 

राम आए थे और उनके भाई 

लक्षमण भी आए थे 

उनके साथ हमारे माता पिता 

माता पिता माता पिता उनके माता पिता  

 बहुत सारे लोगों के साथ,

उन लोगों का मेल मिलाप था 

अभी भानुप्रतापपुर अंतागढ़ की तरफ से 

 नारायण युद्ध के लिए आए हैं खादी का फेंटा 

गांधी टोपी पहनकर लोग 

वे ही क्या हमारा घोटुल भी 

आकर हमें कुछ बताते हैं दंड देंगे क्या 

हमें भय लग रहा है दीदी बेलोसा रानी 

हमें भय लग रहा है दुलोसा देवानिन || 

हल्बी से अनुवाद

            अर्थात इन गीतों के माध्यम से वे कहती हैं कि हमें हमारे बड़े भाईयों ने बताया है कि इस जगह पर कभी माता सीता आईं थी उनके साथ भगवान् राम और उनके भाई लक्षमण भी आए थे | उनके साथ हमारे लोगों का हमारे माता पिता का मेल जोल था, किन्तु अभी भानुप्रतापपुर, अंतागढ़ की तरफ से नारायण युद्ध के लिए आए हैं उनके साथ खादी का फेंटा और सर पर गाँधी टोपी पहनकर लोग आए हैं और वे ही क्यों हमारा घोटुल भी साथ है हमें आकर कुछ बताते हैं अर्थात जानकारी प्रदान करते हैं | दंड देने की बातें करते हैं | हमें भय लग रहा है दीदी बेलोसा रानी और हमें भय लग रहा है दुलोसा देवानिन | हम क्या करें ?

यहाँ वे जानती हैं कि उनका घोटुल उनके साथ है किन्तु दंड देने की बात सुनकर वे भी भयभीत हैं | इस तरह के गीत गाकर वे लोग अपने मन को सांत्वना प्रदान करते थे | गीत के बोल जिसमें कहा गया की भानुप्रतापपुर,अंतागढ़ से नारायण युद्ध के लिए खादी का फेंटा और गाँधी टोपी पहनकर लोग आए हैं तो क्या गाँधी के समय में गुंडाधुर हुए थे | शायद नहीं किन्तु यह सत्य है कि अंतागढ़ के ग्राम तोड़ोकी से ही रानीसुवर्ण कुंवर और लाल कालेन्द्र सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का शंखनाद किया था और उस युद्ध का नेतृत्व का भार गुंडाधुर को सौंपा था जिसने अंग्रेजी शासन की नींव हिलाकर रख दी थी बस्तर में | घोटुल गुड़ी में तब स्वतंत्रता के गीत तैयार किए जाते थे, जिनमें युवतियों द्वारा गाए गए कुछ गीत हैं:-

पहले गीत के जवाब में ही यह दूसरा गीत प्रतिउत्तर के रूप में आया है ——

हमने भी देखा है चैका, जिलमिली,तिलोका, मलको 

 कौन लोग आए हैं , किसलिए आए हैं 

ये लोग कोंडागाँव में भी आए हैं 

और जगदलपुर, सुकमा, दंतावाड़ा में पहुँच गए हैं 

 हमें भी भय लग रहा है, क्या 

ये लोग किसलिए आए हैं || 

हल्बी से अनुवाद

                  अर्थात –दूसरी सखियाँ संबोधित कर रही हैं अपनी अन्य सखियों को यह कि, हमने भी देखा है चैका, जिलमिली, तिलोका, मलको कि कौन लोग आए हैं और किसलिए आए हैं | ये लोग कोंडागांव में भी आए हैं उसके बाद जगदलपुर, सुकमा, दंतेवाड़ा, में भी पहुँच गए हैं | हमें भय लग रहा है | यहाँ पर वे लोग अंग्रेजों के बस्तर प्रवेश की बातें कर रही हैं और अपना भय भी प्रकट कर रही हैं | आगे वे कहती हैं कि हमें भय लग रहा है वे लोग किसलिए आए हैं ? 

तब जवाब में सामने वाले कहते हैं कि हमें भी इस बात की कोई जानकारी नहीं हैं मोटियारिन लड़कियों | अच्छा चलें तो चेलिकों के पास यानि घोटुल गुड़ी के युवाओं की बात वे कर रही हैं, गाँव के माझी मुखिया के पास चलें, देवान के पास चलें, सिरहा के पास चलें और पता करें कि क्या हो रहा है, क्या करना है, इस बात पर सलाह मशवरा कर उनकी राय लें | जब वे सलाह मशवरा कर लेती हैं और चेलिकों, माझी, मुखिया, देवान आदि से चर्चाकर उनकी बातें सुनती हैं तब वे स्वयं को आश्वश्त करते हुए खुद को सांत्वना देते हुए जब वे गाती हैं तो उनके अन्दर का भय कुछ कम होता है और वे कहती हैं कि——

ईर्ष्या दुश्मनी कुछ भी नहीं 

मार पीट लड़ाई-झगड़ा नहीं 

प्यार ममता से रहें माता 

तुम्हारी जय-जय गाएँ माता 

भारत माता-भारत माता 

तुम्हारी जय-जय गाएँ माता 

देश के लिए जीना सीखें 

देश के लिए मरना सीखें 

देश की सेवा करें माता  

तुम्हारी जय-जय गाएँ माता

भारत माता- भारत माता 

तुम्हारी जय-जय गाएँ माता

भारत माता- भारत माता || 

हल्बी से अनुवाद 

               इस तरह भारत माता के प्रति, देश सेवा और देश भक्ति की भावना से ओतप्रोत इन गीतों को सुनकर ,पढ़कर ज्ञात होता है कि बस्तर क्षेत्र जिसे आज भी लोग पिछड़ा और माओवाद के नाम से जानते हैं या चिन्हित करते हैं, वह भी अछूता नहीं रहा स्वतंत्रता की लड़ाई में, जिसमें हमारे बहुत सारे देशभक्त शहीद हुए थे | छत्तीसगढ़ का वह पिछड़ा कहलाने वाला क्षेत्र बस्तर के वीरों ने भी स्वतंत्रता के संघर्ष में बराबर का साथ निभाकर देश सेवा के लिए संघर्ष करते हुए अपने प्राणों का उत्सर्ग तो किया ही, साथ ही अपने गीतों के माध्यम से लोगों में जोश और जज्बा का संचार करके वे अपने देश के प्रति आस्थावान बने रहे | स्वतंत्रता के पचहत्तरवीं वर्ष में आज हम उन वीरों को और उनमें देशभक्ति का जज्बा जगाने वाले गायक-गायिकाओं को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से साथ निभाने वाले देशभक्तों को नमन करते हैं |

                                                                           

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नहर लाइनिंग में भ्रष्टाचार का अंबार: गुणवत्ता दरकिनार, पंडरिया जल संसाधन विभाग पर उठे गंभीर सवाल करोड़ों की परियोजना में नियमों की अनदेखी, निर्माण कार्यों में मिलीभगत के आरोप

Sakshi Bansod