कवर्धा- पुण्यश्लोक लोकमाता, नारीरत्न, महानशिवभक, वीरांगना महारानी देवी अहिल्याबाई होल्कर की 300 जन्म शताब्दी के अवसर पर पण्डरिया में आयोजित एक विशेष कार्यशाला में खंड संयोजक शिवकुमार बंजारे ने अपने उद्बोधन में कहा कि हमें उनके जीवन संघर्षों से प्रेरणा लेकर कार्य करना चाहिए, उन्होंने कहा कि देवी अहिल्याबाई का जीवन नारी सशक्तिकरण, त्याग और दृढ़संकल्प का प्रतीक है उनके द्वारा किए गए सामाजिक कार्य और प्रशासनिक कुशलता आज के समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है, हमें उनके आदर्शों को अपनाते हुए समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में कार्य करना चाहिए। वे मराठा साम्राज्य की प्रमुख शासिका थीं, जिन्होंने 1767 से 1795 तक मालवा क्षेत्र पर शासन किया। उनका जन्म महाराष्ट्र के चौंड़ी गांव में 31मई 1725 को सामान्य किसान (गड़रिया) परिवार हुआ था। अहिल्याबाई ने अपने पराक्रम और निष्ठा के बल पर समाज और राज्य की उन्नति में अहम योगदान दिया। उन्हें “पुण्यश्लोक लोकमाता” के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि वे अपने जनसेवा और सामाजिक कार्यों के लिए प्रसिद्ध थीं।
# जीवन की प्रमुख घटनाएँ: अहिल्याबाई का विवाह खांडेराव होल्कर से हुआ था, जो इंदौर के शासक मल्हारराव होल्कर के पुत्र थे। खांडेराव की मृत्यु के बाद अहिल्याबाई ने अपने ससुर की सहमति से राज्य का शासन संभाला।
शासनकाल में अहिल्याबाई ने न्यायप्रिय, कुशल और धर्मनिष्ठ शासिका के रूप में मालवा क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार किए। उन्होंने कृषि, व्यापार, और सामाजिक सुधारों को बढ़ावा दिया। उनके कार्यों की प्रशंसा अंग्रेज भी करते थे। उन्होंने कई धार्मिक स्थलों का निर्माण करवाया और काशी विश्वनाथ मंदिर, सोमनाथ मंदिर, और रामेश्वरम सहित कई प्रसिद्ध मंदिरों की पुनर्स्थापना करवाई साथ ही 12 ज्योतिर्लिंगों को संरक्षित व संवर्धित कराई।
अहिल्याबाई ने समाज में नारी शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह, और गरीबों की सहायता के लिए अनेक योजनाओं की शुरुआत की। वे समाज के हर वर्ग के लोगों के लिए न्याय और विकास की पक्षधर थीं।
अहिल्याबाई होल्कर का शासनकाल मराठा साम्राज्य के सबसे शांतिपूर्ण और समृद्ध समयों में से एक था। उनकी मृत्यु 1795 में हुई, और उनकी स्मृति आज भी जनमानस में जीवंत है।






