
@अजय जांगड़े
कवर्धा, विडंबना है जिस जिले से प्रदेश में डिप्टी सीएम पदाभिहीत हैं उसी जिले में शिक्षा का हाल बेहाल है। पंडरिया विकासखण्ड के शासकीय प्राथमिक शाला में एक शिक्षक के भरोसे कक्षा 1 ली से लेकर 5 वी तक कक्षाएं संचालित हो रही है। इस विद्यालय में 3 शिक्षकों का नियुक्ति हैं जिसमे प्रधानपाठक गिरधारीलाल पड़वार हैं वहीं सहायक शिक्षक के पद पर राजकुमार बैगा व शिक्षिका आरती पैकरा है।
23 मार्च के बाद से शिक्षक राजकुमार बैगा आज तक ड्यूटी पर विद्यालय नहीं पहुंचे हैं जहां सक्रिय प्रधानाध्यापक के द्वारा उनकी उपस्थिति पंजी में अनुपस्थिति दर्ज किया गया है। अब बात की जाए इस की शिक्षिका पैकरा का जो यह जानते हुए भी संतान पालन की छुट्टी पर गई की इस विद्यालय में पहले से ही विद्यालय में शिक्षक राजकुमार बैगा नही आ रहे हैं बावजूद छुट्टी लेना लाजमी नही है हालाकि संतान पालन की अवकाश उनके अधिकार है। शिक्षक न होने पर विद्यालय की शिक्षा व्यवस्था व संचालन में होने वाली कमी अथवा परेशानी को समझते हुए संतनपालन का अवकाश लेना सही नहीं था।
हीरो अधिकारी ने भी आज तक नही सोचा कि एक शिक्षक के भरोसे विद्यालय संचालन करने में शिक्षा की क्या गुणवत्ता रहेगी और होगा जो आज तक उस विद्यालय में किसी अन्य सहायक शिक्षक को अटैच अथवा नियुक्ति प्रदान नही किया गया है जबकि ऐसा कर सकना खंड शिक्षा अधिकारी के कार्यक्षेत्र अंतर्गत आता है।
विकास खण्ड शिक्षा अधिकारी के कार्यशैली पर सवाल ही सवाल
पंडरिया विकासखण्ड के शासकीय प्राथमिक अथवा पूर्व माध्यमिक विद्यालय में शिक्षकों की जरूरत को पूरा कर सकना उनके बस की बात नहीं परंतु व्यवस्थापन करना ये उनके अधिकार क्षेत्र अंतर्गत है पर ऐसा कुछ नहीं जबकि सहजता से किया जा सकता है।
इस तरह की अनेकों विद्यालय है जहा शिक्षक एक छात्र छात्राओं को संख्या अनेक है। बताते चलें ग्राम पंचायत सोनपुरी में भी प्राथमिक शाला में एक ही शिक्षिका के बल बूते यह द्वितीय सत्र संचालन हो रहा है जो वाकई एक किसी साजिश या विद्वता महान से ओत प्रोत अधिकारी के कार्यक्षेत्र होने का अंदेशा है।
अनुसूचित जाति व अनुसूचित जन जाति क्षेत्र में ही शिक्षा का स्तर बद से बदतर हालात में है आखिर ऐसे अधिकारी जिनके सह या संज्ञान में इस तरह की व्यस्था सुचारू ढंग से क्रियान्वित हो रहा है जो विकासखंड, जिला ही नहीं पूरे छत्तीसगढ़ प्रदेश को लज्जित कर रहा है।
अनेक विद्यालय ऐसे भी हैं जहां फॉमेल्टी मात्र विद्यालय संचालन होता है फिर विद्यालय संचालन बंद कर अपने काम काज पर वापस आ जाते हैं शिक्षक जो तार्किक नहीं वास्तविक है और यह विशेष तौर पर वनांचल इलाकों में अक्सर देखने को पाया जाता है।
विकासखंड शिक्षा अधिकारी को चाहिए कि वह नियमित अपने समयानुसार विद्यालयों की समीक्षा, औचक निरीक्षण करे जिससे शिक्षा व्यवस्था में सुधार तथा बदलाव आ सके जिससे क्षेत्र में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के मासूम बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ ना हो उनकी आने वाले भविष्य का दमन न हो अगर ऐसा होता है तो उसका जिम्मेदार और कोई नहीं विकास खण्ड शिक्षा अधिकारी सहित जिले में बैठे जिला शिक्षा अधिकारी ही है जिनके वजह से सरकार की योजना और नीति, रीति का छात्र छात्राओं को लाभ न मिल पाना।
क्या विकास खण्ड अधिकारी या फिर जिले में शिक्षा अधिकारी के पद पर विराजमान शिक्षा अधिकारी स्वयं सेगौना जो कुकदूर मार्ग पर खंड शिक्षा अधिकारी के कार्यालय से महज चार किलोमीटर की दूरी पर और प्राथमिक शाला सोनपुरी जो ठीक चार किलोमीटर की दूरी पर है विकासखंड शिक्षा अधिकारी के कार्यालय से जहां एक शिक्षक के भरोसे पूरी पांच कक्षाएं संचालित होती हैं पहुचेंगे वहा या अनजान बन अपनी वेतन आने की सिर्फ चिंतन मनन करेंगे। आखिर ग्रामीण इलाकों के बच्चों के प्रति प्रशासन की उदासीनता प्रश्न चिन्ह लगाता है सिस्टम के खिलाफ़।





