अजय जांगड़े
कवर्धा। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ग्रामीण रोजगार योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के अंतर्गत कबीरधाम जिले के पंडरिया जनपद की ग्राम पंचायत डालामौहा में निर्मित चेकडेम कार्यों में गंभीर अनियमितताओं की तस्वीर सामने आई है। उल्लेखनीय है कि इस मामले में किसी स्थानीय नागरिक या जनप्रतिनिधि द्वारा औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है, बल्कि भास्कर दूत के संवाददाता द्वारा स्वयं कार्यस्थल पर पहुंचकर की गई पड़ताल में कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए हैं।
घोघरानाला-भेड़ागढ़ नाला पर स्वीकृत कार्य—कार्य कोड 3302004107/WC/1111599683 एवं 3302004009/WC/1111599586—पर लाखों रुपये की लागत से किए गए निर्माण की वास्तविक स्थिति कागजी दावों से मेल नहीं खाती दिख रही है। स्थल निरीक्षण के दौरान निर्माण में प्रयुक्त सामग्री की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न खड़े हुए। गिट्टी धूलयुक्त एवं लाल रंग की निम्न श्रेणी की प्रतीत हुई, वहीं रेत के नाम पर वन क्षेत्रीय नालों से मिट्टी मिश्रित काली सामग्री उपयोग में लाए जाने के संकेत मिले। निर्धारित तकनीकी मानकों और मिश्रण अनुपात (रेशियो) की अनदेखी कर कार्य पूर्ण दर्शाने का प्रयास साफ झलकता है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह सामने आया कि कार्यस्थल पर अनिवार्य सूचना पटल (इंफॉर्मेशन बोर्ड) का निर्माण ही नहीं किया गया। मनरेगा नियमों के तहत प्रत्येक कार्यस्थल पर स्वीकृत राशि, कार्य विवरण, अवधि और एजेंसी की जानकारी प्रदर्शित करना अनिवार्य है। सूचना पटल का अभाव केवल लापरवाही नहीं, बल्कि पारदर्शिता से बचने और संभावित गड़बड़ियों को छिपाने की सुनियोजित साजिश की ओर संकेत करता है। जब सूचना सार्वजनिक ही नहीं होगी, तो आमजन को यह कैसे ज्ञात होगा कि कितनी राशि स्वीकृत हुई और कितना कार्य वास्तव में संपन्न हुआ?
निरीक्षण के दौरान यह भी संकेत मिले कि श्रमप्रधान योजना होने के बावजूद मशीनों का उपयोग कर कार्य कराया गया, जबकि कागजों में मजदूरों की हाजिरी दर्शाई गई हो—ऐसी आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि मशीनों से कार्य कराकर मजदूरी भुगतान दिखाया गया है, तो यह मनरेगा की मूल भावना पर सीधा प्रहार है। योजना का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराना और पलायन पर रोक लगाना है, किंतु यदि जमीनी स्तर पर रोजगार सृजन के बजाय केवल औपचारिकता निभाई गई, तो यह शासन की नीतियों के साथ छल है।
अब बड़ा सवाल यह है कि तकनीकी स्वीकृति, माप पुस्तिका (एमबी) में दर्ज प्रगति, गुणवत्ता परीक्षण और भुगतान प्रक्रिया की निगरानी किस स्तर पर और किस जिम्मेदारी के साथ की गई? जिला पंचायत, जनपद पंचायत, कार्यक्रम अधिकारी (पीओ), संबंधित तकनीकी सहायक तथा ग्राम पंचायत पदाधिकारियों की जवाबदेही तय होना स्वाभाविक है। क्या निरीक्षण औपचारिकता भर था, या फिर आंख मूंदकर फाइलों में अनुमोदन की मुहर लगा दी गई?
जनहित में आवश्यक है कि जिला प्रशासन तत्काल स्वतंत्र तकनीकी जांच दल गठित कर निर्माण की गुणवत्ता का वैज्ञानिक परीक्षण कराए। मस्टर रोल, बैंक भुगतान, सामग्री आपूर्ति और स्थल वास्तविकता का सोशल ऑडिट कराया जाए। यदि अनियमितता सिद्ध होती है, तो दोषियों पर निलंबन, विभागीय जांच, एफआईआर और शासकीय राशि की रिकवरी जैसी कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
डालामौहा का यह चेकडेम अब केवल एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही की अग्निपरीक्षा बन चुका है। अब निगाहें जिला कलेक्टर और संबंधित विभागीय अधिकारियों पर टिकी हैं—क्या वे निष्पक्ष जांच कर सख्त कार्रवाई करेंगे, या फिर यह मामला भी कागजी कार्यवाही की परतों में दब जाएगा?






