कवर्धा। छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले का पंडरिया क्षेत्र इन दिनों वन संरक्षण नहीं, बल्कि वन दोहन और कथित संगठित लूट को लेकर सुर्खियों में है। पंडरिया वन विकास निगम रेंज में कूप कटिंग के नाम पर निर्धारित नियमों और मानकों की खुली धज्जियां उड़ाए जाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं। अवैध वृक्ष कटाई, इमारती लकड़ी की निकासी, फर्जी चोरी की प्रविष्टियां और रेत तस्करी ने पूरे वन प्रबंधन तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। प्राप्त जानकारियों के अनुसार, पंडरिया रेंज में स्वीकृत कूप कटिंग की प्रक्रिया को ढाल बनाकर अनुमति से कहीं अधिक संख्या में वृक्षों की कटाई की गई। आरोप है कि कीमती इमारती लकड़ी को सुरक्षित रूप से बाहर निकालने के बाद विभागीय अभिलेखों में उसे “अज्ञात चोरों द्वारा चोरी” बताकर दर्ज कर दिया गया। यह तरीका न केवल जिम्मेदारी से बचने का प्रयास माना जा रहा है, बल्कि इससे शासन को लाखों रुपये के राजस्व नुकसान की आशंका भी जताई जा रही है। वन विशेषज्ञों का साफ कहना है कि लाखों रुपये मूल्य की लकड़ी का वन सीमा से बाहर जाना बिना विभागीय मिलीभगत के असंभव है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि यदि चोरी हुई थी, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि चोरी नहीं हुई, तो फिर चोरी की फर्जी प्रविष्टियां दर्ज करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? दोनों ही स्थितियां गंभीर प्रशासनिक विफलता और संभावित सांठगांठ की ओर इशारा करती हैं। मामला केवल लकड़ी तक सीमित नहीं है। पंडरिया रेंज क्षेत्र से होकर बहने वाली नदियों और नालों से अवैध रेत उत्खनन और खुलेआम बिक्री के आरोप भी सामने आ रहे हैं। पर्यावरण जानकारों के अनुसार, अनियंत्रित रेत उत्खनन से नदी तंत्र, भूजल स्तर और स्थानीय पारिस्थितिकी को अपूरणीय क्षति पहुंचती है, लेकिन यहां निगरानी तंत्र या तो अक्षम नजर आ रहा है या जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है। यह पूरा प्रकरण वन विभाग की उस जिम्मेदारी पर प्रश्नचिह्न लगाता है, जिसे जंगलों की रक्षा, वन्य जीवों के संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग के लिए बनाया गया है। पंडरिया में सामने आ रहे आरोप यह संकेत देते हैं कि वन रक्षा के नाम पर कहीं न कहीं वन संपदा का सुनियोजित दोहन किया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर सामाजिक संगठनों और पर्यावरण से जुड़े लोगों ने इस मामले में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है। उनका कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर कठोर विभागीय कार्रवाई, आर्थिक दंड और आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की लूट पर प्रभावी रोक लग सके। पंडरिया वन विकास निगम रेंज का यह मामला अब महज़ एक प्रशासनिक चूक नहीं रह गया है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ में वन प्रबंधन की पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदारी पर सीधा सवाल बन चुका है। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या शासन-प्रशासन इस कथित वन लूट पर सख्त कदम उठाता है, या फिर हर बार की तरह फाइलों में “जांच जारी है” लिखकर जंगलों की कीमत चुकाई जाती