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राल पंचायत में ‘कागज़ी विकास’ का दोहरा खेल उजागर — सड़क बनी नहीं, आंगनबाड़ी गिरे पर खर्च आसमान… ग्रामीणों का फूटा गुस्सा, अब जांच की मांग तेज़!

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कोरबा/कटघोरा:- जनपद पंचायत कटघोरा अंतर्गत ग्राम पंचायत राल में विकास कार्यों की हकीकत अब कागज़ों की चमक से बाहर आकर जमीन की सच्चाई पर खड़ी हो गई है। एक तरफ कागज़ों में 30,000 रुपये की C.C. सड़क का पूरा भुगतान दिखाकर “विकास” का दावा किया जा रहा है, जबकि उसी स्थान पर आज तक एक फावड़ा मिट्टी तक नहीं हिली। दूसरी तरफ दो छोटे आंगनबाड़ी भवनों के डिसमेंटल पर 71,433 रुपये का खर्च दिखाकर ग्रामीणों के सामने एक नया ‘खर्चा खेल’ खड़ा कर दिया गया है। दोनों मामलों ने मिलकर पंचायत प्रशासन की पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पहला मामला — ₹30,000 की ‘कागज़ी सड़क’, जमीन पर शून्य प्रगति!

जुलाई 2025 में पंचायत के पोर्टल पर सी.सी. सड़क निर्माण सामग्री खरीदी और भुगतान का रिकॉर्ड चढ़ाया गया। बिल, वाउचर, भुगतान आदेश—सबकुछ “पूर्ण”।
लेकिन ग्रामीणों के अनुसार— सड़क के लिए न गिट्टी आई,न रेत की बोरी पहुँची,न कोई मजदूर दिखाई दिया,और न ही कोई लेवलिंग या खुदाई का काम हुआ।

जिस स्थान पर सड़क का दावा किया गया है, वहां आज भी वही पुराना, उबड़-खाबड़ रास्ता है जिस पर ग्रामीण बरसों से धूल-मिट्टी में चलने को मजबूर हैं।

सरकारी नियमों के मुताबिक भुगतान तभी संभव है जब-मापन पुस्तिका (एम.बी.) में कार्य की प्रगति दर्ज हो,सामग्री का भौतिक सत्यापन हो,तकनीकी सहायक निरीक्षण रिपोर्ट जारी करे,और कम-से-कम 50–75% कार्य पूरा हो।

लेकिन सवाल यह है कि जब सड़क बनी ही नहीं, तो मापन किसका हुआ? सत्यापन किसने किया? निरीक्षण की रिपोर्ट किस आधार पर बनाई गई? ग्रामीणों ने इसे ‘कागज़ी सड़क’ की उपमा देते हुए कहा—
“अगर कागज़ों में सड़क बनाने से गांव तरक्की करता, तो राल अब तक महानगर बन गया होता।”

युवाओं का भी गुस्सा चरम पर है। एक युवक ने कटाक्ष करते हुए कहा—
“30,000 की सड़क गांव में नहीं दिखी… शायद वो भगवान के रास्ते पर बन गई होगी। कागज़ वाले देवता ही जानते होंगे।”

दूसरा मामला — दो आंगनबाड़ी भवनों के डिसमेंटल में 71,433 रुपये! खर्च देखकर गांव सन्न* पंचायत रिकॉर्ड बताता है कि दो आंगनबाड़ी भवनों को गिराने में पहले भवन पर ₹43,000,दूसरे भवन पर ₹28,433,कुल ₹71,433 रुपये खर्च हुए।

लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक दोनों भवन छोटे, कमजोर और लंबे समय से जर्जर स्थिति में थे। उन्हें गिराने में आमतौर पर 8–10 हजार रुपये से अधिक का खर्च नहीं आता।

लोग कहते हैं—
“ये आंगनबाड़ी थे या कोई थाना-कोतवाली? दो पुराने कमरे गिराने में 71 हजार कैसे उड़ गए?”

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि JCB कितने घंटे चली, मजदूर कितने लगे, कितनी मिट्टी हटाई गई—इनमें से किसी बात का कोई पुख्ता हिसाब पंचायत ने नहीं दिया। इससे संदेह और गहरा हो जाता है कि खर्च को या तो बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है, या फिर खर्च ‘कहीं और’ चला गया है।

ग्रामीण बोल रहें हैं-
“भवन तो गिरा दिया गया… पर लगता है पैसा कहीं और गिरा है।”

सबसे चौंकाने वाली बात यह कि दोनों कार्यों का भुगतान एक ही व्यक्ति को किया गया, और दोनों में खर्च लगभग ‘मैनेज’ जैसा दिख रहा है।

कागज़ों में सब ‘पूर्ण’, जमीन पर सच्चाई ‘शून्य’!

राल पंचायत में ये दोनों मामले पंचायत व्यवस्था की उस सच्चाई को उजागर करते हैं, जिसमें कागज़ों पर विकास तेज़ी से होता है, लेकिन जमीन पर जनता को धोखा मिलता है।

एक तरफ सड़क बनी ही नहीं—
दूसरी तरफ छोटे भवनों को तोड़ने में लाखों जैसी बिलिंग—
यह स्थिति ग्रामीणों की नजर में महज गलती नहीं बल्कि वित्तीय अनियमितता की एक साफ़ तस्वीर है।

कानूनी रूप से कहा जाए तो बिना काम किए भुगतान करना, मापन पुस्तिका फर्जी भरना या निरीक्षण रिपोर्ट बिना सत्यापन जारी करना—पंचायत राज अधिनियम और वित्तीय नियमों के तहत गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में सचिव, सरपंच और तकनीकी सहायक सभी जिम्मेदारी के घेरे में आते हैं।

ग्रामीणों की बढ़ती नाराजगी — “अब कलेक्टर ही सच्चाई बताएंगे!”

अब ग्रामीण इस दोहरे मामले की शिकायत कलेक्टर कोरबा से करने की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है
“काम कम, कागज़ ज्यादा चलता है। जनता का पैसा हवा में उड़ा दिया जा रहा है। अब जांच होना जरूरी है।”

कुछ ग्रामीणों ने यह भी कहा कि इस तरह की घटनाएं पहली बार नहीं हैं। कई बार कागज़ों पर काम ‘पूर्ण’ दिखाया जाता है जबकि गांव की जमीन पर न विकास दिखता है न परिवर्तन।

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