
कबीरधाम। छत्तीसगढ़ सरकार की आबकारी नीति एक बार फिर सवालों के घेरे में है। एक ओर सरकार यह दावा करती है कि वह समाज में नशामुक्ति का अभियान चला रही है, वहीं दूसरी ओर उसी सरकार के नियम युवाओं को शराब की लत लगाने का खुला न्योता दे रहे हैं।
सरकार द्वारा तय नियमों के अनुसार 21 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति शराब की स्थापना, निर्माण और विक्रय कर सकते हैं, पर खरीदने वालों के लिए कोई उम्र सीमा तय नहीं की गई है। यानी 16 या 17 वर्ष का किशोर यदि चाहे तो आसानी से शराब खरीद सकता है — और कानून इसमें कुछ नहीं कहता। यही विरोधाभास आज समाज में बढ़ती नशाखोरी का सबसे बड़ा कारण बन रहा है।
कबीरधाम जिले में यह स्थिति और भी भयावह है। आबकारी विभाग की लापरवाही और दिखावे की जांचों ने जिले में शराब के ठेकों को युवाओं का अड्डा बना दिया है। नाबालिगों को खुलेआम शराब बेची जा रही है, और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है। सवाल यह उठता है कि जब शराब बनाने और बेचने पर उम्र की सीमा तय की जा सकती है तो खरीदने पर क्यों नहीं?
यह नीति न सिर्फ विरोधाभासी है, बल्कि भारतीय समाज की मूल सभ्यता, संस्कार और संस्कृति के साथ खुला मज़ाक भी है। शराब की आसान उपलब्धता ने किशोरों के जीवन को रसातल में धकेल दिया है। स्कूल-कॉलेज के बाहर शराब की बोतलें और नशे में धुत्त युवा अब आम नज़ारा बन चुके हैं।
छत्तीसगढ़िया समाज, जिसे अपनी संस्कृति और परंपराओं पर गर्व था, आज उसी मिट्टी में नशे का जहर घोलने का काम सरकार कर रही है। यह कहना गलत न होगा कि सरकार ने अपने ही भविष्य को ठेके पर बेच दिया है। सवाल साफ है — जब “21 के बाद बेचो” का कानून बन सकता है तो “21 से पहले खरीदो मत” का क्यों नहीं?
अगर सरकार ने अब भी अपनी नीतियों पर पुनर्विचार नहीं किया, तो आने वाला समय छत्तीसगढ़ की नई पीढ़ी के लिए विनाश का कारण बन सकता है।





