अजय जांगड़े
कवर्धा। हिंदू धर्म की परंपरा, भक्ति और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम इस वर्ष राजमहल कवर्धा में देखने को मिला। गौरा-गौरी महोत्सव के पावन अवसर पर नगर एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु राजमहल पहुंचे, जहां आस्था और उल्लास का दृश्य देखते ही बनता था।
कवर्धा रियासत के राजमहल में 12 से अधिक गौरा-गौरी परिवार पहुंचे, राजा ने किया सबका बारी बारी विधिवत पूजन
राजमहल परिसर में परंपरागत वेशभूषा और भक्ति गीतों के साथ पंद्रह गौरा-गौरी परिवार पहुंचे। वातावरण में ढोल-नगाड़ों की गूंज और ‘जय गौरा-गौरी माता की’ के जयघोष से पूरा राजमहल परिसर गूंज उठा। कवर्धा सियासत के राजा ने स्वयं महल प्रांगण में पहुंचकर सभी गौरा-गौरी परिवारों का स्वागत किया और विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर लोक आस्था के इस पर्व को दिव्यता प्रदान की।
आस्था और परंपरा का अनूठा संगम
राजमहल में उमड़ी जनसैलाब ने यह प्रमाणित किया कि कवर्धा की धरती आज भी अपनी परंपराओं और धार्मिक विश्वासों में रची-बसी है। महिलाओं और पुरुषों ने पारंपरिक रीति से गौरा-गौरी की पूजा कर सुख-समृद्धि की कामना की। इस दौरान नगर की गलियां भक्ति संगीत, रंग-बिरंगे परिधानों और पारंपरिक नृत्यों से सराबोर रहीं।
राजा और जनता के बीच अटूट आस्था का बंधन
कवर्धा रियासत का राजमहल वर्षों से लोक आस्था का प्रतीक रहा है। राजपरिवार का यह धार्मिक आयोजन हर वर्ष जनता के साथ एक गहरी भावनात्मक डोर जोड़ता है। इस वर्ष भी राजा द्वारा स्वयं श्रद्धालुओं के बीच जाकर पूजा-अर्चना में सम्मिलित होना इस बात का संदेश है कि कवर्धा की संस्कृति में राज-जन का संबंध केवल शासन नहीं, बल्कि श्रद्धा और परंपरा का प्रतीक है।





