
अजय जांगड़े
कवर्धा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट स्वच्छ भारत मिशन अब अपने ही देश में मज़ाक का विषय बनता जा रहा है। करोड़ों रुपये का बजट खर्च कर देने के बावजूद कबीरधाम जिले के शहरों और गांवों की तस्वीर आज भी वैसी ही है जैसी दस साल पहले थी — सड़कों पर सड़ता कचरा, जाम नालियाँ, और गलियों में फैली दुर्गंध।
केंद्र सरकार ने स्वच्छता को अभियान नहीं, आंदोलन बताया था। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि यह आंदोलन अफसरशाही की लापरवाही, जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता और ठेकेदारी के खेल में दम तोड़ चुका है। नगर पंचायतों और ग्राम पंचायतों में सफाई व्यवस्था कागजों में दर्ज है, जबकि धरातल पर हालात भयावह हैं।
हर साल बजट स्वीकृत होता है, करोड़ों की राशि साफ-सफाई के नाम पर खर्च दिखाई जाती है, लेकिन जब आम नागरिक गलियों में उतरता है, तो उसे मिलता है कचरे का पहाड़ और मच्छरों का साम्राज्य। नालियों की सफाई महीनों तक नहीं होती, और जब होती भी है तो केवल दिखावे के लिए। बरसात में नालियों से निकलता गंदा पानी सड़कों पर फैल जाता है और लोगों को बीमारी का खतरा झेलना पड़ता है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि स्वच्छ भारत मिशन का असली चेहरा अब उजागर हो चुका है। “सरकार हर बार दावा करती है कि शहर और गांव साफ-सुथरे बनाए जाएंगे, लेकिन हम तो रोज़ गंदगी और बदबू के बीच जी रहे हैं। न सफाईकर्मी समय पर आते हैं, न अधिकारी हालात देखने निकलते हैं,” — एक नागरिक ने कहा।
वहीं कई पंचायतों में तो सफाई कर्मचारियों के नाम पर वेतन निकाला जा रहा है, लेकिन कोई कर्मचारी दिखता नहीं। जनप्रतिनिधि इस पर आंख मूंदे हुए हैं। पंचायत सचिवों और अधिकारियों की मिलीभगत से सरकारी बजट फाइलों में गुम हो जाता है।
नगरपालिकाओं में भी हालात कुछ बेहतर नहीं। डस्टबिन टूटे पड़े हैं, कचरा गाड़ियों की संख्या न के बराबर है, और जो हैं भी, वे या तो खराब हालत में हैं या महीनों से गैरेज में धूल फांक रही हैं। वार्डों में कचरे के ढेर अब स्थायी दृश्य बन चुके हैं। नगर के मुख्य बाजारों में सड़ांध की गंध से व्यापारियों और ग्राहकों दोनों का हाल बेहाल है।
सरकार ने स्वच्छता रैंकिंग में सुधार के लिए बड़े-बड़े दावे किए थे, लेकिन कबीरधाम जैसे जिलों में यह योजना केवल कागजी आंकड़ों तक सीमित है। अधिकारियों की लापरवाही और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी ने इस मिशन की गरिमा को धूल में मिला दिया है।
स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत जागरूकता अभियान, शौचालय निर्माण, कचरा प्रबंधन और नालियों की सफाई के लिए भारी-भरकम बजट स्वीकृत हुआ था। मगर नतीजा यह है कि शौचालय अधूरे पड़े हैं, कचरा प्रबंधन केंद्र जर्जर हालत में हैं और सफाई कर्मी खुद असंतुष्ट हैं।
मानना है कि मिशन की असफलता की जड़ में “उत्तरदायित्व का अभाव” है। योजनाएँ बनती हैं, पर निगरानी नहीं होती। ठेकेदार काम पूरा नहीं करते, पर भुगतान समय पर कर दिया जाता है। जनता को शिकायत करने की सुविधा है, लेकिन शिकायतें फाइलों में दबा दी जाती हैं।
अब जनता सवाल कर रही है — आखिर किसने छीना “स्वच्छ भारत” का सपना? क्या यह केवल सरकारी भाषणों और विज्ञापनों में दिखाने का प्रोजेक्ट था? जब जमीनी स्तर पर एक भी गली साफ नहीं, नालियों से गंदा पानी बहता है और मच्छर घरों में पनप रहे हैं, तब सरकार के “स्वच्छ भारत” के दावे जनता के साथ छलावे से कम नहीं लगते।
केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के लिए यह बड़ा सबक है कि योजनाएँ केवल घोषणा से नहीं चलतीं — ईमानदार अमल और जवाबदेही की जरूरत होती है। आज ज़रूरत है कि अफसरों की लापरवाही पर सख्त कार्रवाई हो, सफाई व्यवस्था में पारदर्शिता लायी जाए और जनता को भरोसा दिलाया जाए कि “स्वच्छ भारत” अब केवल नारा नहीं, सच्चाई बनेगा।
लेकिन जब तक अधिकारी दफ्तरों में एसी कमरों से बाहर नहीं निकलेंगे, और जब तक सफाई कर्मियों की जिम्मेदारी तय नहीं की जाएगी, तब तक “स्वच्छ भारत मिशन” का सपना यूं ही गंदगी के ढेरों में दम तोड़ता रहेगा।





