पंडरिया: वनों की रक्षा एवं संरक्षित करने की मंशा से सामान्य वन विभाग की कार्य सीमा व कार्य क्षेत्र को वन विभाग का ही प्रति रूप वन विकास निगम के नाम से जाना जाया जाने वाले विभाग को शासन की ओर से कार्य सौंपा गया है। वहीं वनों को दो भागों बांटा गया है यह स्पष्ट है, जिसमे अधिकाधिक ऐसे क्षेत्र है जिसमे इमारती वृक्षों के साथ साथ अन्य प्रजातियों का भी वृक्षों का संख्या बहुतायत में हैं वह पहाड़ हों या समतल भूमि जो वन विकास निगम के अधीनस्थ वन भूमि आता है।
वन अफसर अपने वनों की रक्षा, वृक्षा रोपण और बिगड़े वनों की सुधार सहित सभी विभागीय कार्य सुचारू रूप से सही तरीके से देखने को मिलती है पर विभाग के ही कुछ लोगों के द्वारा पूरे वन विकास निगम को बदनाम होना पड़ता है ग्राम पंचायत सगौना के क्षेत्र में आने वन विकास निगम के डिप्टी रेंजर के ऊपर 40 हजार रूपए नगद लेने का आरोप लगा है जिससे पूरे क्षेत्र ही नही प्रदेश स्तर पर चर्चा शुरू होना हो गया है। इस तरह के आरोप प्रत्यारोप लगना कोई बड़ी बात नहीं है पर चोर चोर ही होता है जिससे पूरी महकमे में उनकी बिरादरी बदनाम हो गई है। ग्राम सागौना निवासी देव चंद मरावी, पंचराम, परदेशी ने बताया कि हम लोगों को पट्टा, काबिज दिलाने की बात कह डिप्टी रेंजर आशीष पठारे ने हम लोगों से प्रति व्यक्ति दस हजार रुपए लिया है जो 40000 से अधिक रुपए है।
नियम अधिनियम का ज्ञान न रखने व वन विकास निगम की छवि को धूमिल करने वाले इस डिप्टी साहब को तत्काल निलंबन का कार्यवाही कर जांच टीम गठित कर सही निर्णय लिया जाया जाना सही होगा जिससे भ्रष्ट कर्मचारी और सह देने वाले अधिकारी भी इस तरह के कार्यों को गति देने में कतराने को मजबूर हो।
इसी तरह विगत वर्षों में भी ऐसी ही एक मामला आया था सामने जिसमे दो लोगों को निलंबन कर भेजा गया था जेल। ग्राम कमरा खोल के बुधराम बैगा को पेड़ काटे जाने का आरोप लगा था जिसमे वन विकास निगम के अफसर के द्वारा रकम मांगने की बात सामने आई थी जिससे वह अपने आप में क्षुब्ध होकर आत्म हत्या करना मुनासिब समझ इस दुनिया को छोड़ चले जिसके बाद काफी दिनो से वन विकास निगम चर्चाओं में बनी हुई थी वहीं आज लोगों के द्वारा इस तरह की भयावह घटना को भूलने ही जा रहे थे कि ग्राम सागौन में वन भूमि पर कब्जा करने वाले को भगाने को छोड़ उससे रुपए पैसे लेकर पट्टा, काबिज दिलाने की बात कही जा रही है जो शर्म से चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाली कहावत को चरितार्थ करता नजर आ रहा है।
गाडलिंग कर कब्जा करने की रची जाती है साजिश पर वन रक्षक जानबूझकर क्यों रहते हैं अंजान ?
क्या वन विकास निगम के पदाभिहित ओहदेदार अधिकारी इस तरह के अपने वन कर्मी के ऊपर कार्यवाही करने में सक्षम हैं या फिर वही कहानी दोहराएंगे” अंधेर नगरी चौपट राजा टका सेर भाजी टके सेर खाजा ” सवाल यह है कि आखिर किसके सह पर होता है यह कार्य? क्या फिर बुधराम बैगा जैसा कोई भोले भाले लोग कदम उठा लेंगे तो जागेगी वन विकास निगम।