
मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले के ग्राम गोपतपुर क्षेत्र में गोंडवाना साम्राज्य की गौरवगाथा आज भी गूंजती है, जहां राजा शंकरशाह मड़ावी और उनके पुत्र कुंवर रघुनाथ शाह मड़ावी ने अंग्रेज साम्राज्य को ललकारते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। इन दोनों वीरों ने न केवल गोंडवाना की आन, बान और शान के लिए बल्कि सम्पूर्ण भारत की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंका था।
अंग्रेजी हुकूमत को दी खुली चुनौती
राजा शंकरशाह मड़ावी गढ़ा मंडला रियासत के गोंड राजवंश के वीर शासक थे, जिन्होंने अंग्रेजों की गुलामी को सिरे से नकार दिया था। उन्होंने खुले शब्दों में एलान किया— “गोंडवाना हमारा है, इसे विदेशी ताकतों के अधीन नहीं होने देंगे।” उनके पुत्र कुंवर रघुनाथ शाह ने भी पिता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर विद्रोह का नेतृत्व किया।
इन दोनों ने कविताओं, गीतों और लोक संदेशों के जरिए जनता में आज़ादी की चेतना जगाई। यही संदेश ब्रिटिश हुकूमत के लिए खतरे की घंटी बन गया।
विद्रोह और बलिदान की कहानी
वर्ष 1857 में जब पूरे देश में स्वतंत्रता की ज्वाला धधक रही थी, उसी समय शंकरशाह और रघुनाथ शाह ने गोंडवाना की धरती से युद्ध का शंखनाद किया।
ब्रिटिश अधिकारियों ने इन्हें देशद्रोही घोषित कर दिया और षड्यंत्र रचकर गिरफ्तार किया। अंग्रेजों को जब उनके विद्रोह के प्रमाण मिले तो बिना किसी मुकदमे के दोनों को तोप के मुंह से बांधकर मौत के हवाले कर दिया गया।
तोप के मुंह पर हुआ बलिदान
18 सितंबर 1857 का वह दिन गोंडवाना इतिहास का सबसे काला अध्याय बना, जब पिता-पुत्र को जनता के सामने तोप से उड़ा दिया गया। अंग्रेजों का उद्देश्य जनता में डर बैठाना था, मगर इस बलिदान ने विपरीत असर डाला—जनता में विद्रोह की ज्वाला और तेज भड़क उठी।
गोंडवाना की धरती पर अमर हुए शहीद
ग्राम गोपतपुर, जनपद पंचायत बजाग सहित डिंडौरी जिले के लोग आज भी इन वीरों को गोंडवाना साम्राज्य के रक्षक और स्वतंत्रता के प्रथम शहीदों के रूप में याद करते हैं। उनके नाम पर हर वर्ष श्रद्धांजलि समारोह और स्मरण सभाएं आयोजित की जाती हैं।
आज भी जीवंत है उनका संदेश
राजा शंकरशाह मड़ावी और कुंवर रघुनाथ शाह मड़ावी की गाथा केवल इतिहास नहीं, बल्कि उस आत्मसम्मान की पुकार है जिसने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी थी।
इनकी यह अमर वाणी आज भी गूंजती है —
“गोंडवाना हमारा है, हम इसे गुलाम नहीं होने देंगे।”
इनका बलिदान देश की स्वतंत्रता यात्रा का वह स्वर्णिम अध्याय है, जिसने आदिवासी अस्मिता, स्वाभिमान और मातृभूमि प्रेम को अमर कर दिया।





