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एसी कमरों में बैठे अफसर, इधर तड़प-तड़प कर मर गया बायसन: आखिर क्यों मदमस्त रहा वन विभाग?

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एसी कमरों में बैठे अफसर, इधर तड़प-तड़प कर मर गया बायसन: आखिर क्यों मदमस्त रहा वन विभाग?

अजय जांगड़े

कवर्धा। जिले के उप वन मंडल क्षेत्र बदौरा में दुर्लभ वन्य प्राणी बायसन की मौत ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। तीन तीरों से घायल किए गए बायसन की मौत ने विभागीय दावों, संवेदनहीन रवैये और प्रशासनिक निकम्मेपन की परतें खोल दी हैं। जब एक बेजुबान वन्य जीव जिंदगी और मौत से संघर्ष कर रहा था, तब जिम्मेदार अधिकारी आखिर एसी कमरों में बैठकर किस बात का इंतजार कर रहे थे?

जानकारी के अनुसार, शिकारियों ने बायसन पर तीन तीरों से हमला कर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया था। इसके बाद बायसन करीब एक महीने तक क्षेत्र में घायल अवस्था में विचरण करता रहा, फिर वन विभाग के संरक्षण में भी रहा, लेकिन इस पूरे समय में न तो उसका समुचित उपचार कराया गया और न ही किसी विशेषज्ञ पशु चिकित्सक या उच्च स्तरीय उपचार केंद्र तक पहुंचाने की गंभीर कोशिश दिखाई दी। आखिरकार शनिवार रात करीब 9:30 बजे उप वन मंडल क्षेत्र बदौरा में उसकी मौत हो गई।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वन विभाग लगातार प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बायसन के स्वास्थ्य में सुधार होने का दावा करता रहा। विभाग जनता को भरोसा दिलाता रहा कि हालत बेहतर है, निगरानी जारी है और उपचार चल रहा है। यदि सब कुछ ठीक था, तो फिर अचानक मौत कैसे हो गई? क्या विभाग जनता को भ्रमित कर रहा था? क्या सिर्फ कागजों में इलाज चल रहा था?

घटना ने यह भी उजागर कर दिया है कि विभागीय तंत्र जमीन पर कितना खोखला है। सूत्रों के मुताबिक, घायल बायसन को कई बार दर्द से कराहते और कमजोर हालत में देखा गया, लेकिन त्वरित चिकित्सा सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई। सवाल यह है कि जब वन्य प्राणी घायल था, तब क्या विभाग के पास आपातकालीन बचाव दल नहीं था? क्या जिले में वन्य जीवों के लिए कोई मेडिकल व्यवस्था नहीं है? या फिर जिम्मेदार अफसरों ने इसे गंभीरता से लेना ही जरूरी नहीं समझा?

मामले में दो आरोपी अब भी फरार बताए जा रहे हैं, जबकि चार आरोपियों पर कार्रवाई विचाराधीन है। लेकिन असली सवाल सिर्फ आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि विभाग की नाकामी है। शिकारियों ने हमला किया, लेकिन घायल बायसन की मौत आखिर किसकी लापरवाही से हुई?

स्थानीय नागरिकों और वन्यजीव प्रेमियों में भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि वन विभाग अब संरक्षण विभाग कम और कागजी खानापूर्ति का केंद्र ज्यादा बन गया है। जंगलों और वन्य प्राणियों की रक्षा की जिम्मेदारी निभाने के बजाय अफसरशाही केवल बैठकों, बयानबाजी और विज्ञप्तियों तक सीमित नजर आ रही है। अब जिले में कई तीखे सवाल गूंज रहे हैं,क्या वन विभाग सिर्फ वेतन लेने और कागजों में काम दिखाने तक सीमित रह गया है?

क्या घायल वन्य प्राणियों की जान की कोई कीमत नहीं?क्या झूठे स्वास्थ्य बुलेटिन जारी कर सच्चाई छुपाई जा रही थी?

और सबसे बड़ा सवाल—उप वन मंडल क्षेत्र बदौरा में हुई इस बायसन मौत का जिम्मेदार कौन? जिलेवासियों ने मामले की निष्पक्ष जांच, जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई, तथा वन्य जीवों के उपचार हेतु स्थायी, सक्षम और त्वरित चिकित्सा व्यवस्था की मांग की है। अब देखना यह है कि इस मौत पर भी फाइलें चलेंगी या किसी अफसर की जवाबदेही तय होगी।

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