
कवर्धा,देशभर में हर वर्ष 14 अप्रैल को डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जाती है, लेकिन इस बार अंबेडकर जयंती को लेकर राजनीतिक दलों की खामोशी ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
भारतीय राजनीति के दो प्रमुख स्तंभ—भाजपा और कांग्रेस—की ओर से अब तक अंबेडकर जयंती पर किसी बड़े आयोजन या कार्यक्रम की घोषणा नहीं की गई है। इस सन्नाटे ने आम जनता और सामाजिक संगठनों के बीच गहरी नाराजगी पैदा कर दी है। डॉ. अंबेडकर, जिन्होंने देश को संविधान का स्वरूप दिया और सामाजिक न्याय की मजबूत नींव रखी, आज उन्हीं के सम्मान को लेकर राजनीतिक उदासीनता सामने आ रही है। विडंबना यह है कि उसी संविधान के सहारे नेता सत्ता के उच्चतम पदों तक पहुंचे, लेकिन जब उनके निर्माता को सम्मान देने की बात आई, तो वही दल पीछे नजर आ रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह केवल कार्यक्रमों की कमी नहीं, बल्कि विचारधारा और प्रतिबद्धता का भी सवाल है। क्या अंबेडकर जयंती केवल औपचारिकता बनती जा रही है? क्या महापुरुषों का सम्मान अब राजनीतिक सुविधा के अनुसार तय किया जाएगा?
स्थानीय स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर लोगों में आक्रोश देखा जा रहा है। कई सामाजिक संगठनों ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अनदेखी बताते हुए सभी दलों से जवाब मांगा है। जैसे-जैसे 14 अप्रैल नजदीक आ रही थी, यह सवाल और तेज होता जा रहा है कि क्या इस बार अंबेडकर जयंती केवल एक तारीख बनकर रह जाएगी, या फिर राजनीतिक दल अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए इसे वास्तविक सम्मान का स्वरूप देंगे।





