
अजय जांगड़े
कवर्धा।
कबीरधाम जिले में प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच गहरी खाई एक बार फिर उजागर हुई है। ग्राम पंचायत चौरा (भोरमदेव) की शासकीय उचित मूल्य दुकान में राशन वितरण के नाम पर जिस तरह से गरीबों के अधिकारों का खुला उल्लंघन किया जा रहा है, उसने पूरी सार्वजनिक वितरण प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय स्तर पर सामने आए मामले के अनुसार, राशन कार्ड धारियों को 35 किलोग्राम चावल बोरे सहित तौलकर दिया जा रहा है। परिणामस्वरूप, वास्तविक रूप से हितग्राहियों को मात्र 34.500 किलोग्राम चावल ही मिल पा रहा है। यानी प्रति कार्ड लगभग 500 ग्राम से अधिक की सीधी कटौती की जा रही है। यह न सिर्फ तकनीकी गड़बड़ी है, बल्कि सुनियोजित तरीके से गरीबों के हिस्से में सेंध लगाने का मामला प्रतीत होता है।
जानकारी के मुताबिक, उक्त दुकान में कुल 359 राशन कार्ड पंजीकृत हैं। ऐसे में हर माह सैकड़ों किलो चावल की हेराफेरी होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यह स्थिति केवल एक दुकान तक सीमित है या पूरे जिले में इसी तरह का खेल चल रहा है—यह अब जांच का विषय बन चुका है।
चौंकाने वाली बात यह भी है कि शक्कर वितरण में भी अनियमितता खुलकर सामने आई है। हितग्राहियों से प्रति किलोग्राम 20 रुपये की वसूली की जा रही है, जो स्पष्ट रूप से निर्धारित दरों और नियमों का उल्लंघन है। यह कृत्य न केवल भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है, बल्कि सीधे तौर पर गरीबों के अधिकारों का हनन भी है।
इसी बीच, 07 अप्रैल को जिले की 516 राशन दुकानों में “चावल उत्सव” मनाने का प्रशासनिक दावा भी अब कटघरे में है। एक ओर उत्सव के नाम पर पारदर्शिता और सुचारू वितरण की बातें की गईं, वहीं दूसरी ओर हजारों क्विंटल चावल की शॉर्टेज और महीनों से राशन से वंचित हितग्राहियों की वास्तविकता इन दावों को पूरी तरह खोखला साबित कर रही है।
सूत्रों के अनुसार, जिले के कई गांवों में “केवाईसी (KYC)” प्रक्रिया का हवाला देकर राशन वितरण में देरी की जा रही है। लेकिन जमीनी स्तर पर यह प्रक्रिया भ्रष्टाचार को छुपाने का एक माध्यम बनती नजर आ रही है। सवाल यह उठता है कि क्या केवाईसी वास्तव में जरूरतमंदों की मदद के लिए है, या फिर इसे गड़बड़ियों पर पर्दा डालने के लिए ढाल बनाया जा रहा है?
सबसे गंभीर पहलू यह है कि इतने बड़े स्तर पर अनियमितताओं के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी बनी हुई है। न तो किसी प्रकार की ठोस जांच के संकेत मिल रहे हैं और न ही दोषियों पर कार्रवाई की कोई पहल दिखाई दे रही है। यह निष्क्रियता कहीं न कहीं पूरे तंत्र की संलिप्तता की ओर इशारा करती है।
अब यह सवाल आम जनता के बीच तेजी से उठ रहा है कि “चावल उत्सव” जैसे आयोजन आखिर किसके लिए किए जा रहे हैं? जब गरीब अपने हक के अनाज के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं, तब ऐसे उत्सव केवल दिखावा और प्रचार का माध्यम प्रतीत होते हैं।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक हो गई है। दोषियों से गबन की राशि की वसूली, संबंधित राशन दुकान संचालक पर कड़ी कार्रवाई और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करना अब समय की मांग बन चुकी है।
यदि इसके बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता, तो यह स्पष्ट संकेत होगा कि सिस्टम खुद इस लूट का संरक्षक बन चुका है। ऐसे में “चावल उत्सव” जैसे आयोजन जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने के अलावा कुछ भी नहीं रह जाएंगे।





