
अजय जांगड़े
कवर्धा।
एक ओर जहां कबीरधाम जिले में प्रशासन द्वारा बड़े दावे करते हुए 07 अप्रैल को 516 राशन दुकानों में “चावल उत्सव” मनाने का ढोल पीटा गया, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। जिले में हजारों क्विंटल चावल की शॉर्टेज के आरोप पहले से ही चर्चा में हैं, लेकिन इसके बावजूद महीनों से राशन से वंचित राशन कार्ड धारियों की सुध लेने वाला कोई नहीं दिख रहा।
सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि कबीरधाम जिले की शासकीय उचित मूल्य की राशन दुकानों में चावल की भारी शॉर्टेज की पुष्टि अब सिर्फ आरोपों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त सत्यापित दस्तावेजों के आधार पर भी इसकी पुष्टि हो चुकी है। दस्तावेज यह साफ संकेत देते हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में गंभीर अनियमितताएं और भारी गड़बड़ी मौजूद है।
सूत्रों के अनुसार, कई गांवों में हितग्राहियों को पिछले महीनों का चावल तक नहीं मिला है। “केवाईसी (KYC) प्रक्रिया” का हवाला देकर वितरण में देरी और गड़बड़ी को छुपाने की कोशिश की जा रही है, जबकि इस आड़ में राशन गबन की आशंका और गहरी होती जा रही है। सबसे गंभीर बात यह है कि इतने बड़े स्तर पर अनियमितताओं के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों पर अब तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई है।
प्रशासन की ओर से दावा किया गया कि चावल उत्सव के दौरान सतर्कता समिति, जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति में पारदर्शी तरीके से वितरण किया गया। लेकिन सवाल उठता है कि जब जमीनी स्तर पर हजारों हितग्राही अपने हक के अनाज से वंचित हैं, तो आखिर यह “उत्सव” किसके लिए मनाया गया?
कलेक्टर द्वारा खाद्य विभाग को समुचित भंडारण और वितरण के निर्देश दिए जाने की बात भी कही गई, परन्तु हकीकत में कई राशन दुकानों में न तो पर्याप्त स्टॉक मिला और न ही वितरण की पारदर्शिता दिखाई दी। जिले के खाद्य अधिकारी द्वारा पारदर्शिता और जनभागीदारी के दावे भी कागजों तक सीमित नजर आ रहे हैं।
अब बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि जब गरीबों के हिस्से का चावल ही गायब है, तो प्रशासन किस चेहरे से “चावल उत्सव” मनाने का साहस कर रहा है? क्या यह महज एक दिखावटी कार्यक्रम बनकर रह गया है, जिसमें भ्रष्टाचार और लापरवाही को ढंकने की कोशिश की जा रही है?
स्थिति को देखते हुए अब आवश्यकता है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, दोषियों से गबन की राशि की वसूली हो और जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए, ताकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में जनता का भरोसा बहाल हो सके।





