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पार्षद भी न बन सके चेहरों को सौंपी गई कांग्रेस की बागडोर,डूबती नाव में नए मल्लाहों की तलाश

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अजय जांगड़े 
कवर्धा।राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक चर्चाओं से घिरे कवर्धा नगर में इन दिनों कांग्रेस पार्टी की आंतरिक उठापटक आम जनमानस के बीच सबसे बड़ा विषय बनकर उभरी है। हिंदू–मुस्लिम विवाद, प्रशासनिक निष्क्रियता और स्थानीय समस्याओं के बीच अब कांग्रेस संगठन का नेतृत्व चयन भी जनता की कसौटी पर खरा उतरता नहीं दिख रहा। चर्चा इस बात को लेकर है कि जो चेहरे अपने ही वार्ड से पार्षद तक नहीं बन सके, उन्हें कांग्रेस ने संगठन की कमान सौंप दी है।
स्थानीय लोगों और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनावी राजनीति में असफल रहे व्यक्तियों पर संगठन का इतना बड़ा दायित्व डालना पार्टी की रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सवाल यह नहीं है कि कौन नेता है, सवाल यह है कि जिस व्यक्ति को जनता ने नकार दिया, क्या वही व्यक्ति जनता को फिर से कांग्रेस की ओर मोड़ पाएगा?
कांग्रेस हाईकमान पर यह आरोप लग रहे हैं कि ज़मीनी सच्चाई को दरकिनार कर भावनाओं, सिफारिशों और बंद कमरों में लिए गए फैसलों के आधार पर संगठन चलाने की कोशिश की जा रही है। पार्टी की इस कार्यशैली से न केवल पुराने और संघर्षशील कार्यकर्ता आहत हैं, बल्कि आम समर्थकों में भी निराशा गहराती जा रही है।पार्टी से दशकों से जुड़े अनुभवी नेताओं को दरकिनार कर ऐसे चेहरों को आगे बढ़ाया गया है जिनकी न तो संगठन पर पकड़ दिखती है और न ही जनता के बीच कोई ठोस जनाधार। इसे राजनीतिक भाषा में “अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारना” कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। परिणाम यह निकलता प्रतीत हो रहा है कि कांग्रेस की नाव पार होने के बजाय डूबती चली जा रही है।
कबीरधाम जिला, जो कभी कांग्रेस की मज़बूत राजनीतिक पहचान का गढ़ माना जाता था, आज उसी पार्टी के लिए चिंता का विषय बन चुका है। जिले में संगठन की कमजोरी, गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर असमंजस ने कांग्रेस को न केवल प्रदेश बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी हासिये पर ला खड़ा किया है।पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा खुलकर होने लगी है कि क्या अब कांग्रेस में अनुभव, संघर्ष और निष्ठा का कोई मूल्य नहीं रह गया है? क्या वर्षों तक पार्टी की सेवा करने वाले नेता केवल दर्शक बनकर रह जाएंगे और निर्णय ऐसे लोग लेंगे जो खुद चुनावी रण में असफल रहे?
राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी तैर रहा है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व अब इस स्थिति में आ गया है जहां युवा के आगे को सलाम ठोकना पड़े, और अनुभव को बोझ समझा जाने लगे? यदि यही स्थिति रही, तो आने वाले चुनावों में कांग्रेस के लिए राह और कठिन हो सकती है। जनता अब केवल बयान नहीं, बल्कि ज़मीनी बदलाव और ठोस नेतृत्व देखना चाहती है। अन्यथा कांग्रेस का यह कारवां, दिशा और चालक दोनों के अभाव में, मंज़िल तक पहुँचने से पहले ही बिखरता नज़र आएगा।

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